सिंहासन बत्तीसी की कहानियाँ | Sinhasan Battisi Ki Kahaniyan in Hindi

सिंहासन बत्तीसी की कहानियाँ (Sinhasan Battisi Ki Kahaniyan): “सिंहासन बतीसी” संस्कृत साहित्य की एक रचना है, और यह उत्तरी संस्करण में “सिंहासन द्वातृंशिका” और दक्षिणी संस्करण में “विक्रमचरित” के रूप में उपलब्ध है। ऐसा माना जाता है कि ये कहानियाँ अतीत में क्षेबेंद्र नामक ऋषि द्वारा लिखी गई थीं। बंगाल में इसका श्रेय वररुचि को भी दिया जाता है। इसलिये आज हम आपके लिये सिंहासन बत्तीसी की कहानियाँ (Sinhasan Battisi Ki Kahaniyan in Hindi) लेकर आये हैं। जिनको पढ़कर आपको भी बहुत सारा ज्ञान और शिक्षा देगी। जो कि आपके जीवन में बहुत काम आएगी। तो आइये दोस्तों पढ़ते हैं, सिंहासन बत्तीसी की मजेदार कहानियाँ।

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सिंहासन बत्तीसी की कहानियाँ (Sinhasan Battisi ki Kahaniyan in Hindi)

“सिंहासन बतीसी” या “सिंहासन बत्तीसी” जिसे (“सिंहासन द्वातृंशिका” और “विक्रमचरित”) भी कहा जाता है। लोक कथाओं का एक संग्रह है जो करिश्माई और न्यायप्रिय शासक, लोगों के प्रिय नेता, दूरदर्शी और बुद्धिमान राजा, महाराजा विक्रमादित्य के इर्द-गिर्द घूमती है। , भारतीय लोककथाओं का एक प्रमुख पात्र। हम बचपन से ही ऐसी अनेक कहानियाँ पढ़ते आ रहे हैं जिनमें उनके असाधारण गुणों की प्रशंसा की गई है। “सिंहासन बतीसी” भी ऐसा ही एक संग्रह है, जिसमें 32 कहानियाँ शामिल हैं जो राजा विक्रमादित्य के चरित्र के विभिन्न पहलुओं को खूबसूरती से चित्रित करती हैं।

“सिंहासन बतीसी” के दक्षिणी संस्करण ने अधिक लोकप्रियता हासिल की और इसका विभिन्न क्षेत्रीय भाषाओं में अनुवाद किया गया, जो पौराणिक कथाओं की तरह भारतीय मौखिक परंपरा का एक अभिन्न अंग बन गया। हालाँकि इसकी रचना की सटीक अवधि का पता लगाना मुश्किल है, लेकिन अनुमान है कि इसे प्रसिद्ध “बैताल पच्चीसी” के बाद 11वीं शताब्दी के समय पर या निष्चित ही उसके बाद लिखा गया होगा। इसका नाम “द्वात्रिंशत्पुत्तलिका” है।

इन कहानियों का कथानक एक ऐसी कहानी पर आधारित है जहां राजा भोज चंद्रभान नाम के एक साधारण चरवाहे से आकर्षित हो जाते हैं, जो अनपढ़ होने के बावजूद एक टीले पर बैठकर निर्णय देने की क्षमता रखता है। चंद्रभान की अद्वितीय क्षमता के बारे में उत्सुक होकर, राजा भोज भेष बदलकर उसे एक जटिल मामले को सुलझाते हुए देखते हैं। उसके निर्णयों और आत्मविश्वास से प्रभावित होकर, राजा भोज चंद्रभान की असाधारण क्षमताओं के बारे में और अधिक जानना चाहते हैं। चंद्रभान ने खुलासा किया कि शक्ति टीले में ही निहित है, और जो कोई भी उस पर बैठता है उसे असाधारण ज्ञान प्राप्त होता है।

और अधिक उत्सुक होकर, राजा भोज ने टीले की खुदाई करने का फैसला किया और उसके अंदर दफन एक शानदार सिंह सिंहासन की खोज की। सिंहासन बत्तीस पुतलियों और बहुमूल्य रत्नों से सुशोभित है। हालाँकि, जब राजा उस पर बैठने की कोशिश करता है, तो कठपुतलियाँ उसका मज़ाक उड़ाना शुरू कर देती हैं। उनकी हँसी से उत्सुक होकर, राजा भोज ने उनसे कारण पूछा, और प्रत्येक कठपुतली राजा विक्रमादित्य के बारे में एक कहानी सुनाना शुरू कर देती है, जिसमें उन गुणों पर जोर दिया जाता है जो एक योग्य और गुणी शासक में होने चाहिए।

ये कहानियाँ इतनी लोकप्रिय हैं, कि कई संग्राहकों ने इन्हें विभिन्न रूपों में प्रस्तुत किया है, प्रत्येक में कठपुतलियों के लिए अलग-अलग व्यवस्था और नाम हैं। हम आपके लिये इन कहानियों को उल्लिखित कठपुतलियों के नामों के माध्यम से बता रहे हैं। हम यह सुनिश्चित करते हैं, कि आप इन सभी कहानियों को एक ही स्थान पर पढ़ सकते हैं। आईये शुरु करते हैं, सिंहासन बत्तीसी की कहानियाँ।

सिंहासन बत्तीसी की पहली कहानी – “पुतली रत्नमंजरी की कथा”

एक समय में, अम्बावती नाम का एक राज्य था। राजा गंधर्वसेन एक धर्मात्मा और न्यायप्रिय शासक थे। उनकी चार रानियां थीं। उनकी पहली पत्नी ब्राह्मण थीं, दूसरी क्षत्रिय, तीसरी वैश्य और चौथी शूद्र थीं। उनकी पहली पत्नी से उन्हें एक पुत्र हुआ, जिसका नाम ब्राह्मणीत रखा गया। उनकी दूसरी पत्नी से उन्हें तीन पुत्र हुए, जिनके नाम शंख, विक्रमादित्य और भर्तृहरि थे। उनकी तीसरी पत्नी से उन्हें एक पुत्र हुआ, जिसका नाम चंद्र था। और उनकी चौथी पत्नी से उन्हें एक पुत्र हुआ, जिसका नाम धन्वन्तरि था।

राजकुमार विक्रमादित्य बचपन से ही बुद्धिमान और साहसी थे। वे राजा बनने के लिए उत्सुक थे। एक दिन, उन्होंने अपने पिता से कहा, “पिता, मैं राजा बनना चाहता हूं।”

राजा गंधर्वसेन ने कहा, “तुम अभी बहुत छोटे हो। तुम्हें अभी और पढ़ाई करनी चाहिए।”

लेकिन राजकुमार विक्रमादित्य नहीं माने। उन्होंने अपने पिता से कहा, “मैं पहले से ही बहुत कुछ जानता हूं। मैं राजा बनने के लिए तैयार हूं।”

राजा गंधर्वसेन को राजकुमार विक्रमादित्य की लगन देखकर खुशी हुई। उन्होंने उन्हें राजा बनने की अनुमति दे दी।

राजकुमार विक्रमादित्य ने एक योग्य मंत्री का चुनाव किया। उन्होंने अपने राज्य की व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाया। वे एक न्यायप्रिय और उदार शासक थे। उन्होंने अपने राज्य में शांति और समृद्धि लायी।

एक दिन, राजा विक्रमादित्य को पता चला कि एक राजा बाहुबल के पास एक ऐसा सिंहासन है, जिस पर जो भी बैठता है, वह सात द्वीप नवखंड का राजा बन जाता है। राजा विक्रमादित्य को उस सिंहासन पर बैठने की इच्छा हुई।

उन्होंने अपने मंत्री को बाहुबल के पास भेजा और सिंहासन मांगा। बाहुबल ने राजा विक्रमादित्य को सिंहासन दे दिया।

राजा विक्रमादित्य ने सिंहासन पर बैठा और सात द्वीप नवखंड का राजा बन गया। उन्होंने अपने राज्य को और अधिक समृद्ध और शक्तिशाली बनाया।

सिंहासन बत्तीसी की पहली पुतली रत्नमंजरी

राजा विक्रमादित्य के सिंहासन में बत्तीस पुतलियाँ लगी हुई थीं। जब राजा विक्रमादित्य सिंहासन पर बैठे, तो पहली पुतली रत्नमंजरी प्रकट हुई।

रत्नमंजरी ने राजा विक्रमादित्य को बताया कि वह एक जादू की पुतली है। उसने राजा विक्रमादित्य को सिंहासन पर बैठने की अनुमति दी थी।

रत्नमंजरी ने राजा विक्रमादित्य को एक शर्त रखी। उसने कहा कि राजा विक्रमादित्य को हमेशा न्यायप्रिय और उदार शासक बनना होगा। अगर राजा विक्रमादित्य ने कभी भी अन्याय किया, तो वह उन्हें सिंहासन से उतार देगी।

राजा विक्रमादित्य ने रत्नमंजरी की शर्त मान ली। उन्होंने हमेशा न्यायप्रिय और उदार शासक बनने का संकल्प लिया।

राजा विक्रमादित्य ने रत्नमंजरी के साथ मिलकर अपने राज्य को एक स्वर्ग बना दिया। उनके राज्य में शांति और समृद्धि सदैव बनी रही।

कहानी से शिक्षा

इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि हमें हमेशा न्यायप्रिय और उदार होना चाहिए। हमें दूसरों के साथ दया और करुणा से पेश आना चाहिए। अगर हम ऐसा करते हैं, तो हम भी एक दिन राजा विक्रमादित्य की तरह एक महान शासक बन सकते हैं।

सिंहासन बत्तीसी की कहानी में, राजा भोज एक चमत्कारी सिंहासन के मालिक हैं। यह सिंहासन 32 पुतलियों से बना है, जिनमें से प्रत्येक एक अलग कहानी सुनाता है। दूसरी पुतली चित्रलेखा की कहानी है।

चित्रलेखा एक सुंदर और बुद्धिमान लड़की थी। वह राजा विक्रमादित्य की पुत्री थी। एक दिन, राजा विक्रमादित्य ने अपने मंत्री को चित्रलेखा की शादी करने के लिए एक राजकुमार की तलाश करने के लिए भेजा। मंत्री ने एक राजकुमार को पाया जो चित्रलेखा से शादी करने के लिए तैयार था।

शादी की तैयारियां शुरू हो गईं। चित्रलेखा बहुत खुश थी। वह अपने नए पति से मिलने के लिए उत्साहित थी। लेकिन अचानक, एक बुरी आत्मा ने चित्रलेखा पर कब्जा कर लिया। वह एक दुष्ट महिला बन गई।

राजा विक्रमादित्य बहुत दुखी थे। उन्होंने अपने मंत्री को चित्रलेखा को बचाने के लिए भेजा। मंत्री ने चित्रलेखा को बुरी आत्मा से मुक्त कर दिया। चित्रलेखा फिर से अपनी सामान्य खुद हो गई।

चित्रलेखा ने अपने पति से कहा कि वह अब राजकुमार से शादी नहीं करेगी। वह एक साधु बनना चाहती थी। चित्रलेखा ने अपने पति को छोड़ दिया और एक जंगल में चली गई।

जंगल में, चित्रलेखा ने योग की शिक्षा ली। वह एक शक्तिशाली योगी बन गई। वह लोगों की मदद करने के लिए अपने शक्तियों का इस्तेमाल करती थी।

एक दिन, एक बूढ़ा आदमी चित्रलेखा के पास आया। उसने चित्रलेखा से कहा कि उसकी बेटी एक बीमार थी। चित्रलेखा ने बूढ़े आदमी की बेटी को ठीक कर दिया। बूढ़ा आदमी चित्रलेखा का बहुत आभारी था।

चित्रलेखा एक महान योगी और साधु बन गई। वह लोगों की मदद करने के लिए अपने जीवन का उपयोग करती थी।

चित्रलेखा की कहानी एक प्रेरणादायक कहानी है। यह हमें बताता है कि हम अपने जीवन में कुछ भी हासिल कर सकते हैं, अगर हमारे पास दृढ़ संकल्प और साहस है। यह हमें यह भी बताता है कि हमें दूसरों की मदद करने के लिए अपने जीवन का उपयोग करना चाहिए।

सिंहासन बत्तीसी की तीसरी कहानी – “पुतली चंद्रकला की कथा”

सिंहासन बत्तीसी एक लोककथा संग्रह है जिसमें 32 कथाएँ 32 पुतलियों के मुख से कही गई हैं। यह एक बार राजा भोज को एक चरवाहे से प्राप्त होता है। वह तीन दिन तक सिंहासन पर बैठने से मना करता है, क्योंकि वह जानता है कि वह अभी तक पुरुषार्थ और भाग्य जैसे गुणों को नहीं प्राप्त कर पाया है। तीसरे दिन, तीसरी पुतली चंद्रकला उसे रोकती है और उसे विक्रमादित्य की कहानी सुनाने लगती है।

चंद्रकला बताती है कि विक्रमादित्य एक महान राजा थे जो पुरुषार्थ और भाग्य दोनों में निपुण थे। एक बार, पुरुषार्थ और भाग्य में इस बात पर बहस हुई कि कौन बड़ा है? पुरुषार्थ का मानना ​​था कि बगैर मेहनत के कुछ भी संभव नहीं है जबकि भाग्य का मानना ​​था कि जिसको जो भी मिलता है भाग्य से मिलता है। उनके विवाद ने ऐसा उग्र रूप ग्रहण कर लिया कि दोनों को देवराज इन्द्र के पास जाना पड़ा।

इन्द्र ने दोनों को एक परीक्षा देने का फैसला किया। उन्होंने पुरुषार्थ को एक उद्यान में भेजा और उसे छह महीने में इसे ऐसा बनाना था कि वह एक स्वर्गलोक जैसा दिखे। उन्होंने भाग्य को एक भिखारी के रूप में एक गाँव में भेजा और उसे छह महीने में ऐसा करना था कि वह एक अमीर आदमी बन जाए।

पुरुषार्थ ने कड़ी मेहनत की और उद्यान को एक स्वर्गलोक जैसा बना दिया। भाग्य ने भिखारी के रूप में गाँव में प्रवेश किया और उसे जल्द ही पता चला कि एक अमीर आदमी की बेटी उससे प्यार करती है। उसने उसके साथ शादी कर ली और जल्द ही वह एक अमीर आदमी बन गया।

छह महीने बाद, इन्द्र ने पुरुषार्थ और भाग्य को वापस बुलाया। उन्होंने पुरुषार्थ को उद्यान दिखाया और वह बहुत खुश हुआ। उन्होंने भाग्य को भी बुलाया और उसे बताया कि वह अमीर आदमी बन गया है।

पुरुषार्थ ने कहा, “मैंने यह सब अपनी मेहनत से हासिल किया है। भाग्य ने बस किस्मत से सब कुछ प्राप्त किया है।”

भाग्य ने कहा, “मैंने भी अपनी मेहनत की है। मैंने भिखारी के रूप में गाँव में प्रवेश किया और जल्द ही एक अमीर आदमी बन गया।”

इन्द्र ने कहा, “पुरुषार्थ, तुमने सच कहा। तुमने अपनी मेहनत से सब कुछ हासिल किया है। भाग्य, तुमने भी अपनी मेहनत की है, लेकिन तुम्हारी मेहनत पुरुषार्थ की मेहनत से कम है।”

इन्द्र ने पुरुषार्थ को विजेता घोषित किया। चंद्रकला ने कहा, “हे राजा भोज, इस कहानी से तुम्हें यह सीख मिलती है कि पुरुषार्थ से ही सब कुछ संभव है। भाग्य की भी जरूरत होती है, लेकिन पुरुषार्थ की तुलना में उसकी भूमिका कम होती है।”

राजा भोज ने चंद्रकला की बात मान ली और वह सिंहासन पर बैठ गया। वह एक महान राजा बना और अपने राज्य को धन्य बना दिया।

पुतली चंद्रकला की कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि पुरुषार्थ से ही सब कुछ संभव है। भाग्य की भी जरूरत होती है, लेकिन पुरुषार्थ की तुलना में उसकी भूमिका कम होती है।

सिंहासन बत्तीसी की चौथी कहानी – “पुतली कामकंदला की कथा”

एक बार की बात है, राजा विक्रमादित्य अपने दरबार में बैठे थे। तभी एक ब्राह्मण भागते हुए आया और बोला, “महाराज, एक अजीब बात हो रही है। मानसरोवर में सूर्योदय होते ही एक खंभा प्रकट होता है। सूर्य का प्रकाश ज्यों-ज्यों फैलता है, ऊपर उठता चला जाता है। जब सूर्य की गर्मी अपनी पराकाष्ठा पर होती है, तो वह साक्षात सूर्य को स्पर्श करता है। ज्यों-ज्यों सूर्य की गर्मी घटती है, छोटा होता जाता है तथा सूर्यास्त होते ही जल में विलीन हो जाता है।”

राजा विक्रमादित्य को यह बात सुनकर बहुत आश्चर्य हुआ। उन्होंने ब्राह्मण से कहा, “यह बात तो बहुत ही अद्भुत है। मैं स्वयं जाकर देखना चाहता हूं।”

राजा विक्रमादित्य ने अपने सेनापति को आदेश दिया कि वह एक सेना लेकर मानसरोवर जाए और उस खंभे का पता लगाए। सेनापति ने राजा की आज्ञा का पालन किया और एक सेना लेकर मानसरोवर चला गया।

कुछ दिनों बाद सेनापति वापस आया और राजा को बताया कि उसने उस खंभे को देखा है। खंभा बहुत ही सुंदर था। सूर्य का प्रकाश उस पर पड़ते ही वह चमक उठता था।

राजा विक्रमादित्य को खंभा देखने की बहुत इच्छा थी। उन्होंने अपने मंत्रियों से सलाह ली। मंत्रियों ने कहा, “महाराज, यह खंभा देवताओं का प्रतीक है। इसे छूना या नुकसान पहुंचाना पाप है।”

राजा विक्रमादित्य ने मंत्रियों की बात मानी और खंभा नहीं छुआ। उन्होंने सेनापति को आदेश दिया कि वह खंभे के पास एक मंदिर बनवाए। मंदिर बन जाने के बाद राजा विक्रमादित्य ने मंदिर में जाकर पूजा-अर्चना की।

राजा विक्रमादित्य की दानशीलता और त्याग की भावना से देवताओं को बहुत प्रसन्नता हुई। उन्होंने राजा से कहा, “महाराज, हम आपकी दानशीलता और त्याग की भावना से बहुत प्रसन्न हैं। हम आपको एक वरदान देना चाहते हैं।”

राजा विक्रमादित्य ने कहा, “हे देवताओं, आप मुझे जो भी वरदान देना चाहते हैं, मैं उसे स्वीकार करता हूं।”

देवताओं ने कहा, “महाराज, हम आपको यह वरदान देते हैं कि आपका राज्य सदा सुख-शांति से भरा रहेगा। आपके राज्य में कभी भी अकाल, महामारी या युद्ध नहीं होगा।”

राजा विक्रमादित्य देवताओं के वरदान से बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने देवताओं का धन्यवाद किया।

सिंहासन बत्तीसी की चौथी कहानी का नैतिक शिक्षा यह है कि दानशीलता और त्याग की भावना से मनुष्य को हमेशा सुख-समृद्धि प्राप्त होती है।

सिंहासन बत्तीसी की 5वीं कहानी – “पुतली लीलावती की कथा”

एक समय की बात है, उज्जैन नगर में एक राजा विक्रमादित्य राज्य करते थे। वे एक न्यायप्रिय और दानवीर राजा थे। उनकी प्रजा उनसे बहुत प्यार करती थी। एक दिन, राजा विक्रमादित्य अपने दरबार में बैठे थे कि एक ब्राह्मण उनके पास आया। उसने राजा से कहा कि वह एक महल बनवाना चाहता है।

राजा विक्रमादित्य ने ब्राह्मण की बात सुनकर कहा, “मैं तुम्हारे लिए एक भव्य महल बनवा दूंगा।”

ब्राह्मण बहुत खुश हुआ। उसने राजा से कहा, “मैं इस महल में लक्ष्मी जी की मूर्ति स्थापित करना चाहता हूं।”

राजा विक्रमादित्य ने कहा, “मैं तुम्हारी यह इच्छा भी पूरी कर दूंगा।”

राजा ने अपने कारीगरों को बुलाया और ब्राह्मण के लिए एक भव्य महल बनवाने का आदेश दिया। महल बनकर तैयार हुआ तो राजा ने उसमें लक्ष्मी जी की मूर्ति स्थापित की।

ब्राह्मण ने महल में प्रवेश किया और लक्ष्मी जी की पूजा की। उसने महल को देखा तो वह बहुत खुश हुआ। उसने राजा विक्रमादित्य का बहुत धन्यवाद दिया।

एक दिन, ब्राह्मण के घर में एक आग लग गई। सब कुछ जलकर राख हो गया। ब्राह्मण और उसकी पत्नी ने महल में शरण ली।

रात में, लक्ष्मी जी ने ब्राह्मण की पत्नी को स्वप्न में बताया, “मैं तुम्हारी मदद करूंगी।”

रात के अंधेरे में, लक्ष्मी जी महल में आईं। उन्होंने ब्राह्मण और उसकी पत्नी को आशीर्वाद दिया।

सुबह जब ब्राह्मण और उसकी पत्नी उठे तो उन्होंने देखा कि आग बुझ चुकी है। सब कुछ पहले जैसा ही था।

ब्राह्मण और उसकी पत्नी बहुत खुश हुए। उन्होंने लक्ष्मी जी का धन्यवाद किया।

राजा विक्रमादित्य को जब यह बात पता चली तो वह बहुत खुश हुए। उन्होंने ब्राह्मण को बुलाया और उसे कहा, “मैं तुम्हारी परीक्षा लेना चाहता हूं।”

राजा ने ब्राह्मण से कहा, “मैं तुम्हें तुम्हारा महल दे रहा हूं। तुम इसे अपने चाहने वाले को दे सकते हो।”

ब्राह्मण ने कहा, “मैं इस महल को वापस आपके पास सौंपता हूं। मुझे इस महल की कोई जरूरत नहीं है।”

राजा विक्रमादित्य ने ब्राह्मण की बात सुनकर कहा, “तुम बहुत दानवीर हो। तुमने मुझे परीक्षा में पास कर दिया।”

राजा ने ब्राह्मण को बहुत सारा धन और आभूषण दिए। ब्राह्मण राजा विक्रमादित्य का धन्यवाद किया और अपने घर चला गया।

कथा का शिक्षा

इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि हमें दानशीलता और न्यायप्रियता का गुण रखना चाहिए। हमें दूसरों की मदद करनी चाहिए, चाहे वे हमारे शत्रु ही क्यों न हों।

सिंहासन बत्तीसी की छठी कहानी – “पुतली रविभामा की कथा”

सिंहासन बत्तीसी की छठी कहानी “पुतली रविभामा की कथा” है। इस कहानी में, रविभामा नामक एक पुतली राजा भोज को बताती है कि महाराज विक्रमादित्य के पास अतिथि-सत्कार का क्या गुण था।

एक बार, महाराज विक्रमादित्य अपने राज्य में भ्रमण कर रहे थे। रास्ते में, उन्होंने एक नदी के किनारे एक ब्राह्मण परिवार को देखा। परिवार बहुत गरीब था और भूख से तड़प रहा था। ब्राह्मण ने विक्रमादित्य से कहा कि वह आत्महत्या करना चाहता है क्योंकि वह अपनी पत्नी और बच्चे को भूख से मरता नहीं देख सकता।

विक्रमादित्य ने ब्राह्मण परिवार को अपने साथ महल ले गए और उनकी पूरी तरह से देखभाल की। उन्होंने उन्हें अच्छा भोजन दिया, उन्हें साफ कपड़े पहनाए, और उन्हें आरामदायक बिस्तर दिए। ब्राह्मण परिवार विक्रमादित्य की दयालुता से बहुत प्रभावित हुआ।

एक दिन, ब्राह्मण ने विक्रमादित्य से कहा कि वह उनके शरीर पर लगी विष्ठा साफ करे। विक्रमादित्य ने बिना किसी हिचकिचाहट के ब्राह्मण की बात मान ली। जैसे ही उन्होंने ब्राह्मण के शरीर को छुआ, अचानक एक चमत्कार हुआ। ब्राह्मण के शरीर पर से विष्ठा गायब हो गई और उसके स्थान पर देवताओं के समान वस्त्र आ गए। उसका चेहरा तेजस्वी हो गया और उसके शरीर से सुगंध निकलने लगी।

ब्राह्मण ने विक्रमादित्य को बताया कि वह एक देवता था जो मानव रूप में अवतरित हुआ था। उसने विक्रमादित्य को बताया कि वह उनके अतिथि-सत्कार से बहुत प्रसन्न था। उसने विक्रमादित्य को बताया कि एक अच्छा राजा बनने के लिए अतिथि-सत्कार का गुण बहुत आवश्यक है।

पुतली रविभामा ने राजा भोज से कहा कि महाराज विक्रमादित्य के पास अतिथि-सत्कार का गुण था। वे हमेशा अपने अतिथियों का सम्मान करते थे और उनकी पूरी तरह से देखभाल करते थे। यही गुण उन्हें एक महान राजा बनाता था।

यह कहानी हमें सिखाती है कि अतिथि-सत्कार एक महत्वपूर्ण गुण है। हमें अपने अतिथियों का सम्मान करना चाहिए और उनकी पूरी तरह से देखभाल करनी चाहिए।

सिंहासन बत्तीसी की सातवीं कहानी – “पुतली सुकेशी की कथा”

एक समय की बात है, एक नगर में एक धनी व्यापारी रहता था। उसके पास एक सुंदर पुत्री थी जिसका नाम सुकेशी था। सुकेशी बहुत ही बुद्धिमान और सुशील थी। वह सभी कलाओ में निपुण थी। वह गाना, बजाना, नृत्य और कविता लिखना जानती थी।

एक दिन, राजा विक्रमादित्य ने एक महान यज्ञ का आयोजन किया। उस यज्ञ में पूरे देश से राजा-महाराजाओं और विद्वानों का आगमन हुआ। व्यापारी की पुत्री सुकेशी भी उस यज्ञ में गई।

यज्ञ में, राजा विक्रमादित्य ने सभी विद्वानों से एक प्रश्न पूछा, “संसार में सबसे बड़ा सुख क्या है?”

इस प्रश्न का उत्तर देने में सभी विद्वान असमर्थ रहे। अंत में, सुकेशी ने आगे बढ़कर कहा, “महाराज, संसार में सबसे बड़ा सुख है, दूसरों की सेवा करना।”

राजा विक्रमादित्य सुकेशी की बुद्धिमत्ता से बहुत प्रभावित हुए। उन्होंने उसे अपनी दरबार में बुलाया और उसे एक पुतली का पद दिया।

सुकेशी अपने नए पद पर बहुत खुश थी। वह राजा विक्रमादित्य की सेवा में तत्पर रहती थी। वह हमेशा दूसरों की मदद के लिए तैयार रहती थी।

एक दिन, एक राजकुमारी अपने पिता के साथ राजा विक्रमादित्य के दरबार में आई। वह बहुत ही सुंदर थी। राजकुमारी ने राजा विक्रमादित्य से कहा, “महाराज, मैं एक ऐसी पुतली चाहती हूं जो मेरे सभी मनोरंजन करे।”

राजा विक्रमादित्य ने सुकेशी को बुलाया और कहा, “सुकेशी, राजकुमारी को एक ऐसी पुतली बनाओ जो उसके सभी मनोरंजन करे।”

सुकेशी ने राजकुमारी की बातें सुनीं और उसे एक ऐसी पुतली बना दी जो उसके सभी मनोरंजन करती थी। राजकुमारी सुकेशी की बनाई हुई पुतली से बहुत खुश थी।

एक दिन, राजकुमारी ने सुकेशी से कहा, “सुकेशी, तुम तो एक बहुत ही अच्छी कलाकार हो। तुम एक ऐसी पुतली क्यों नहीं बनाती जो बोल सके और चल सके?”

सुकेशी ने राजकुमारी की बात मान ली और उसने एक ऐसी पुतली बना दी जो बोल सकती थी और चल सकती थी। राजकुमारी सुकेशी की बनाई हुई पुतली से बहुत खुश थी।

सुकेशी की कला के बारे में राजा विक्रमादित्य को पता चला। उन्होंने सुकेशी को बुलाया और कहा, “सुकेशी, तुमने एक ऐसी पुतली बनाई है जो बोल सकती है और चल सकती है। यह बहुत ही अद्भुत है।”

राजा विक्रमादित्य ने सुकेशी की बनाई हुई पुतली को एक बड़े मंदिर में रखवा दिया। वह पुतली हमेशा लोगों को आश्चर्यचकित करती थी।

सुकेशी राजा विक्रमादित्य की सेवा में हमेशा तत्पर रहती थी। वह दूसरों की मदद के लिए हमेशा तैयार रहती थी। उसकी कला के कारण वह पूरे देश में प्रसिद्ध हो गई।

कहानी का शिक्षाप्रद पक्ष

इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि दूसरों की सेवा करना ही सबसे बड़ा सुख है। हमें हमेशा दूसरों की मदद के लिए तैयार रहना चाहिए।

सिंहासन बत्तीसी की आठवीं कहानी – “पुतली पुष्पवती की कथा”

एक बार राजा भोज ने सिंहासन बत्तीसी में प्रवेश किया और उस पर बैठने का प्रयास किया। लेकिन जैसे ही वह बैठने लगा, एक पुतली जाग उठी और बोली, “ठहरो राजन, अभी तुम इस सिंहासन पर बैठने के योग्य नहीं हुए हो।”

राजा भोज को यह बात बहुत बुरी लगी। वह पुतली से बहुत क्रोधित हुआ और बोला, “मैंने इस सिंहासन पर बैठने के लिए बहुत मेहनत की है। मैं इस सिंहासन पर बैठने का हकदार हूं।”

पुतली बोली, “राजन, तुमने इस सिंहासन पर बैठने के लिए मेहनत तो की है, लेकिन तुमने अभी भी बहुत कुछ सीखना बाकी है। तुम अभी भी एक अधूरे राजा हो।”

राजा भोज को पुतली की बातों पर विश्वास नहीं हुआ। वह बोला, “मैं एक अधूरा राजा नहीं हूं। मैं एक पूर्ण राजा हूं।”

पुतली बोली, “राजन, अगर तुम एक पूर्ण राजा होते तो तुम इस सिंहासन पर बिना किसी कठिनाई के बैठ सकते थे। लेकिन तुम इस सिंहासन पर बैठने से पहले ही हिचकिचा रहे हो। यह इस बात का सबूत है कि तुम अभी भी एक अधूरे राजा हो।”

राजा भोज पुतली की बातों से बहुत प्रभावित हुआ। वह सोचने लगा कि शायद पुतली सही कह रही है। शायद वह अभी भी एक अधूरा राजा है।

राजा भोज ने पुतली से कहा, “पुतली, तुम मुझे बताओ कि एक पूर्ण राजा कैसा होना चाहिए?”

पुतली बोली, “एक पूर्ण राजा को बुद्धिमान, दयालु, न्यायप्रिय और वीर होना चाहिए। उसे अपने राज्य के लोगों का ख्याल रखना चाहिए। उसे हमेशा अपने राज्य की रक्षा के लिए तैयार रहना चाहिए।”

राजा भोज ने पुतली की बातों को ध्यान से सुना। वह बोला, “पुतली, मैं तुम्हारी बातों को मानता हूं। मैं एक पूर्ण राजा बनने के लिए कड़ी मेहनत करूंगा।”

राजा भोज ने पुतली की बातों को अपने दिल में बिठा लिया। वह एक पूर्ण राजा बनने के लिए कड़ी मेहनत करने लगा। वह अपने राज्य के लोगों की भलाई के लिए काम करने लगा। वह अपने राज्य की रक्षा के लिए तैयार रहने लगा।

कुछ समय बाद, राजा भोज एक पूर्ण राजा बन गया। वह अपने राज्य के लोगों का प्यार और सम्मान पाने लगा। वह एक महान राजा के रूप में इतिहास में अमर हो गया।

नैतिक:

एक सफल व्यक्ति बनने के लिए हमें लगातार सीखना और बढ़ना चाहिए। हमें हमेशा अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए कड़ी मेहनत करनी चाहिए।

सिंहासन बत्तीसी की नवीं कहानी – “पुतली मधुमालती की कथा”

एक बार राजा भोज ने सिंहासन पर बैठने के लिए 8 पुतलियों को बुलाया। हर दिन एक नई पुतली सिंहासन पर बैठती और एक कहानी सुनाती। राजा भोज को हर दिन सुनी जाने वाली कहानियां बहुत पसंद आती थीं।

नौवीं पुतली मधुमालती थी। मधुमालती बहुत ही सुंदर और बुद्धिमान थी। उसने राजा विक्रमादित्य की एक कहानी सुनाई। कहानी इस प्रकार थी:

राजा विक्रमादित्य एक महान राजा थे। वे अपनी प्रजा के लिए बहुत प्रिय थे। वे न्यायप्रिय और दयालु थे। एक दिन राजा विक्रमादित्य ने राज्य और प्रजा की सुख-समृद्धि के लिए एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया। कई दिनों तक यज्ञ चलता रहा।

एक दिन राजा यज्ञ में बैठे थे कि एक ऋषि आए। ऋषि ने राजा को बताया कि उनके आठ शिष्य जंगल में लकड़ी लेने गए थे। तभी वहां दो राक्षस आ गए और उन सभी को पकड़कर एक पहाड़ी की चोटी पर ले गए। ऋषि ने राजा से मदद मांगी।

राजा ने ऋषि की बात सुनकर तुरंत अपने घोड़े पर सवार होकर उस पहाड़ी की तरफ चल पड़े। पहाड़ी के नीचे पहुंचकर उन्होंने अपना घोड़ा छोड़ दिया और पैदल ही पहाड़ी पर चढ़ने लगे।

पहाड़ी का रास्ता बहुत ही कठिन था, लेकिन राजा ने कठिनाई की परवाह नहीं की। वे चलते-चलते पहाड़ी की चोटी पर पहुंच गए।

पहाड़ी की चोटी पर पहुंचकर उन्होंने देखा कि दो राक्षस उनके शिष्यों को कैद करके रख रखे हैं। राक्षसों ने राजा को देखते ही कहा कि अगर वह अपनी जान बचाना चाहता है, तो उसे अपने सिर को उनकी बलि के लिए दे देना चाहिए।

राजा विक्रमादित्य ने बिना किसी हिचकिचाहट के अपना सिर बलि के लिए झुका दिया। तभी अचानक एक चमत्कार हुआ। दोनों राक्षस अदृश्य हो गए और उनके शिष्य मुक्त हो गए।

राजा विक्रमादित्य और उनके शिष्य सुरक्षित नीचे आ गए। ऋषि ने राजा को धन्यवाद दिया और कहा कि वह एक महान राजा हैं।

कहानी सुनकर राजा भोज बहुत प्रभावित हुए। उन्होंने मधुमालती से पूछा कि राजा विक्रमादित्य ने ऐसा क्यों किया?

मधुमालती ने कहा, “राजा विक्रमादित्य एक महान राजा थे। वे अपनी प्रजा के लिए कुछ भी कर सकते थे। उन्हें अपने शिष्यों की जान बचाने के लिए अपना सिर तक देना पड़ा।”

राजा भोज ने कहा, “सच ही है, राजा विक्रमादित्य एक महान राजा थे।”

राजा भोज को मधुमालती की कहानी बहुत पसंद आई। उन्होंने उसे सिंहासन पर बैठने दिया। राजा भोज ने मधुमालती से कहा कि वह उनके सलाहकार के रूप में रहेंगी।

मधुमालती ने राजा भोज की सलाहकार के रूप में बहुत अच्छा काम किया। उसने राजा भोज को कई अच्छे निर्णय लेने में मदद की। राजा भोज बहुत खुश थे कि उन्होंने मधुमालती को सिंहासन पर बैठने दिया।

इस कहानी से हमें सीख मिलती है कि हमें अपनी प्रजा के लिए कुछ भी कर सकते हैं। हमें अपने स्वार्थ को छोड़कर दूसरों के लिए जीना चाहिए।

सिंहासन बत्तीसी की दसवीं कहानी – “पुतली प्रभावती की कथा”

सिंहासन बत्तीसी एक प्रसिद्ध हिंदी लोककथा है जिसमें 32 पुतलियों के माध्यम से एक राजा को सही राजा बनने के लिए आवश्यक गुणों की शिक्षा दी जाती है। इनमें से दसवीं पुतली का नाम प्रभावती है।

एक बार राजा भोज सिंहासन पर बैठने के लिए दरबार पहुंचे। तभी सिंहासन से एक सुंदर पुतली प्रभावती प्रकट हुई और राजा को रोकते हुए कहा, “हे राजा, तुम अभी तक सिंहासन पर बैठने के योग्य नहीं हो। पहले तुम राजा विक्रमादित्य की कहानी सुनो।”

प्रभावती ने राजा भोज को एक कहानी सुनाई। एक बार राजा विक्रमादित्य शिकार खेलते-खेलते जंगल में भटक गए। रास्ते में उन्होंने देखा कि एक युवक एक पेड़ पर लटका हुआ है। राजा ने युवक को नीचे उतारकर उसकी बातें सुनीं।

युवक ने बताया कि वह एक गरीब किसान का बेटा है। उसकी शादी एक सुंदर राजकुमारी से होने वाली थी, लेकिन उसके पिता ने उसकी शादी के लिए एक शर्त रखी थी। शर्त यह थी कि युवक खौलते तेल से सकुशल निकल आए।

राजा विक्रमादित्य ने युवक की मदद करने का फैसला किया। उन्होंने स्वयं खौलते तेल से सकुशल निकलकर युवक को अपना वरदान दिया। राजकुमारी ने राजा विक्रमादित्य से शादी की और वे दोनों सुख से रहने लगे।

कहानी सुनाकर प्रभावती ने राजा भोज से कहा, “हे राजा, तुमने राजा विक्रमादित्य की कहानी सुनी। क्या तुम उनके जैसा दयालु और उदार हो सकते हो? क्या तुम दूसरों की मदद करने के लिए तैयार हो?”

राजा भोज ने कहा, “मैं राजा विक्रमादित्य की तरह एक महान राजा बनूंगा। मैं दूसरों की मदद करने के लिए हमेशा तैयार रहूंगा।”

प्रभावती ने राजा भोज को सिंहासन पर बैठने दिया। राजा भोज ने अपने शासनकाल में राजा विक्रमादित्य की तरह ही न्याय और दया का पालन किया। वे एक महान राजा के रूप में प्रसिद्ध हुए।

कहानी से सीख: दूसरों की मदद करना और उनके दुखों को दूर करना एक महान गुण है। एक सच्चे राजा को दूसरों की मदद करने के लिए हमेशा तैयार रहना चाहिए।

सिंहासन बत्तीसी की ग्यारवीं कहानी – “पुतली इंद्रसेना की कथा”

सिंहासन बत्तीसी की कहानी “पुतली इंद्रसेना की कथा” एक रोमांचक और दिलचस्प कहानी है जो एक खूबसूरत पुतली, इंद्रसेना, और एक राजकुमार, अरविंद की कहानी बताती है।

यह कहानी एक ऐसे राज्य में शुरू होती है जहां राजा और रानी एक खूबसूरत पुतली, इंद्रसेना, बनाते हैं। इंद्रसेना एक बहुत ही बुद्धिमान और सुंदर पुतली थी, और जल्द ही वह राजा और रानी के लिए एक बहुत ही प्रिय सदस्य बन गई।

एक दिन, एक राजकुमार, अरविंद, इंद्रसेना से मिलने के लिए आया। अरविंद इंद्रसेना के रूप और बुद्धि से तुरंत ही मंत्रमुग्ध हो गया, और जल्द ही उन दोनों को प्यार हो गया।

राजा और रानी ने अरविंद और इंद्रसेना की शादी का फैसला किया। शादी एक भव्य समारोह था, और इंद्रसेना और अरविंद एक साथ बहुत खुश थे।

हालांकि, उनका सुख कुछ ही समय तक चला। एक दिन, एक दुष्ट जादूगर, इंद्रसेना को चुरा ले गया। अरविंद ने इंद्रसेना को बचाने के लिए एक लंबी और कठिन यात्रा शुरू की।

अपनी यात्रा के दौरान, अरविंद ने कई चुनौतियों का सामना किया। उसे जंगलों में भटकना पड़ा, पहाड़ों पर चढ़ना पड़ा, और दानवों और राक्षसों से लड़ना पड़ा।

अंत में, अरविंद इंद्रसेना को जादूगर के महल में पाया। अरविंद ने जादूगर को हराया और इंद्रसेना को मुक्त कर दिया।

अरविंद और इंद्रसेना एक साथ घर लौट आए, और वे हमेशा खुशी से रहे।

यह कहानी एक प्यार की कहानी है जो विश्वास, साहस और जीत की शक्ति को दर्शाती है। यह एक ऐसी कहानी है जो सभी को प्रेरित करती है, चाहे उनकी उम्र या पृष्ठभूमि कुछ भी हो।

यहां इस कहानी से कुछ प्रेरणादायक सीखें: हमेशा अपने सपनों के लिए लड़ें। कभी हार न मानें, चाहे कितनी भी मुश्किल हो। प्रेम और विश्वास सबसे शक्तिशाली शक्तियां हैं। मुझे उम्मीद है कि आपको यह कहानी पसंद आई होगी।

सिंहासन बत्तीसी की बारवीं कहानी – “पुतली इन्दुमती की कथा”

“सिंहासन बत्तीसी” एक हिंदू पौराणिक कथा है जो 18वीं शताब्दी में लिखी गई थी। इस कहानी में, एक राजा के पास एक खूबसूरत पुतली होती है जिसका नाम इन्दुमती होता है। पुतली इतनी सुंदर होती है कि राजा उसे अपनी बेटी मानता है।

एक दिन, एक राजकुमार इन्दुमती के बारे में सुनता है और उससे शादी करना चाहता है। राजा राजकुमार की शादी इन्दुमती से करने के लिए राजी हो जाता है।

शादी के बाद, राजकुमार और इन्दुमती एक साथ खुशी-खुशी रहने लगते हैं। एक दिन, राजकुमार को एक युद्ध में जाना पड़ता है। वह इन्दुमती को अपने घर पर अकेला छोड़ देता है।

युद्ध के दौरान, राजकुमार को पता चलता है कि वह मरने वाला है। वह इन्दुमती को एक पत्र लिखता है और उसे एक गुप्त मंत्र देता है। पत्र में, वह उसे बताता है कि अगर वह उस मंत्र का प्रयोग करे तो वह उसे वापस ला सकती है।

जब राजकुमार की मृत्यु हो जाती है, तो इन्दुमती बहुत दुखी हो जाती है। वह राजकुमार के पत्र को पढ़ती है और मंत्र का प्रयोग करती है। मंत्र के प्रभाव से, राजकुमार की आत्मा पुतली के शरीर में प्रवेश कर जाती है।

राजकुमार की आत्मा के पुतली के शरीर में प्रवेश करने के बाद, इन्दुमती फिर से खुश हो जाती है। वह राजकुमार के साथ फिर से रहने लगती है।

एक दिन, एक जादूगर इन्दुमती के बारे में सुनता है। वह इन्दुमती को अपने वश में करना चाहता है। जादूगर इन्दुमती के पास जाता है और उसे एक जादू का हार देता है। जादूगर कहता है कि अगर इन्दुमती हार पहन लेगी तो वह हमेशा सुंदर रहेगी।

इन्दुमती जादूगर की बातों में आ जाती है और हार पहन लेती है। हार के प्रभाव से, इन्दुमती का शरीर पत्थर का हो जाता है।

जादूगर इन्दुमती को अपने साथ ले जाता है और उसे एक गुफा में कैद कर देता है। राजकुमार को जब यह पता चलता है तो वह जादूगर को खोजने निकल पड़ता है।

राजकुमार जादूगर को ढूंढ लेता है और उसे हरा देता है। राजकुमार जादूगर से हार छीन लेता है और उसे इन्दुमती के गले में पहना देता है। हार के प्रभाव से, इन्दुमती का शरीर फिर से पहले जैसा हो जाता है।

राजकुमार और इन्दुमती फिर से खुशी-खुशी रहने लगते हैं। वे एक लंबे और सुखी जीवन बिताते हैं।

यह कहानी हमें बताती है कि प्यार और विश्वास की ताकत से कोई भी कठिनाई पार की जा सकती है।

सिंहासन बत्तीसी की तेरहवीं कहानी: “पुतली कीर्तिमती की कथा”

सिंहासन बत्तीसी की तेरहवीं कहानी “पुतली कीर्तिमती की कथा” है। इस कहानी में, एक राजा कीर्कित्तध्वज रोजाना एक लाख स्वर्ण मुद्राएं दान करता है। महाराज विक्रमादित्य को राजा कीर्कित्तध्वज की इस भक्ति और दयालुता से बहुत प्रभावित हुए। वे राजा कीर्कित्तध्वज के रहस्य को जानना चाहते थे।

एक दिन, महाराज विक्रमादित्य राजा कीर्कित्तध्वज के महल में जाकर उनसे मिले। उन्होंने राजा कीर्कित्तध्वज से कहा कि वे उनके राज्य में एक साल तक उनके अंगरक्षक के रूप में रहना चाहते हैं। राजा कीर्कित्तध्वज ने महाराज विक्रमादित्य को अपने दरबार में अंगरक्षक के रूप में नियुक्त कर लिया।

महाराज विक्रमादित्य ने देखा कि राजा कीर्कित्तध्वज रोज शाम को कहीं जाता है और लौटते समय एक थैली में स्वर्ण मुद्राएं लेकर आता है। महाराज विक्रमादित्य को यह पता नहीं चल पाया कि राजा कीर्कित्तध्वज स्वर्ण मुद्राएं कहां से लाता है।

एक दिन, महाराज विक्रमादित्य ने राजा कीर्कित्तध्वज का पीछा किया। उन्होंने देखा कि राजा कीर्कित्तध्वज एक मंदिर में जाता है और नहा धोकर वहां पर मौजूद देवी की मूर्ति के सामने बड़े कड़ाहे में तेल डालकर उसमें कूद जाता है। महाराज विक्रमादित्य यह देखकर चौंक गए।

महाराज विक्रमादित्य आगे बढ़ने वाले होते ही हैं, लेकिन यह देखकर रुक जाते हैं कि वहां पर दो जोगनियां आती हैं और राजा कीर्कित्तध्वज के शरीर को नोच-नोच कर खा जाती हैं। जब जोगनियां चली जाती हैं, तो देवी प्रकट होती है और अमृत की बूंद से राजा कीर्कित्तध्वज को जीवित कर देती हैं।

देवी राजा कीर्कित्तध्वज को एक लाख स्वर्ण मुद्राएं देती हैं और राजा कीर्कित्तध्वज उन मुद्राएं को लेकर महल लौट जाता है।

महाराज विक्रमादित्य इस रहस्य को जानकर बहुत खुश हुए। अगले दिन, महाराज विक्रमादित्य ने भी राजा कीर्कित्तध्वज के जैसे ही किया। उन्होंने नहा धोकर मंदिर में जाकर कड़ाहे में तेल डालकर उसमें कूद गए।

जोगनियां जब महाराज विक्रमादित्य के शरीर को नोच-नोच कर खा रही थीं, तभी देवी प्रकट हुई। देवी ने महाराज विक्रमादित्य को जीवित करने के लिए अमृत की बूंदें डालीं, लेकिन अमृत की बूंदें उनके शरीर में नहीं समा रही थीं।

देवी को समझ आया कि महाराज विक्रमादित्य एक योद्धा हैं और उनके शरीर में बहुत अधिक शक्ति है। इसलिए, देवी ने महाराज विक्रमादित्य को एक शक्तिशाली योद्धा बना दिया।

महाराज विक्रमादित्य को शक्तिशाली योद्धा बनने के बाद, उन्होंने कई युद्ध लड़े और कई राजाओं को हराया। उन्होंने अपने राज्य को एक शक्तिशाली राज्य बनाया।

इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि हमें हमेशा दूसरों की मदद करनी चाहिए। दूसरों की मदद करने से हमें भी पुण्य मिलता है और हमें भी खुशी मिलती है।

सिंहासन बत्तीसी की चौदवीं कहानी – “पुतली प्रबोधवती की कथा”

एक समय की बात है, एक नगर में एक राजा रहता था। राजा बहुत ही धनी और शक्तिशाली था, लेकिन वह बहुत ही अत्याचारी भी था। वह अपने प्रजा पर बहुत ही जुल्म करता था। उसकी प्रजा उसे बहुत ही नफरत करती थी।

राजा के पास एक बहुत ही सुंदर पुतली थी, जिसका नाम प्रबोधवती था। प्रबोधवती बहुत ही बुद्धिमान और सुशील थी। वह राजा के अत्याचारों से बहुत दुखी थी। वह चाहती थी कि राजा अपने अत्याचारों से बाज़ आ जाए और प्रजा पर दया करे।

एक दिन, प्रबोधवती ने राजा से कहा, “महाराज, आप बहुत ही अत्याचारी हैं। आप अपनी प्रजा पर बहुत ही जुल्म करते हैं। मैं चाहती हूं कि आप अपने अत्याचारों से बाज़ आएं और प्रजा पर दया करें।”

राजा को प्रबोधवती की बातें बहुत बुरी लगीं। उसने प्रबोधवती को कैद कर लिया। प्रबोधवती को कैद में देखकर प्रजा बहुत ही दुखी हुई। उन्होंने राजा के खिलाफ विद्रोह कर दिया।

राजा को पता चला कि प्रजा ने उसके खिलाफ विद्रोह कर दिया है। वह बहुत ही घबराया। उसने प्रबोधवती को कैद से रिहा कर दिया। प्रबोधवती ने राजा को समझाया कि उसे अपने अत्याचारों से बाज़ आना चाहिए।

राजा ने प्रबोधवती की बात मान ली। उसने अपनी प्रजा पर दया करना शुरू कर दिया। प्रजा बहुत ही खुश हुई। उन्होंने राजा को धन्यवाद दिया।

प्रबोधवती ने राजा को एक नीति दी, “जो राजा अपनी प्रजा पर दया करता है, वह हमेशा सुखी रहता है। जो राजा अपनी प्रजा पर अत्याचार करता है, वह हमेशा दुखी रहता है।”

राजा ने प्रबोधवती की नीति को अपना लिया। वह अपनी प्रजा पर बहुत ही दयालु राजा बन गया। उसकी प्रजा बहुत ही खुश थी।

नैतिक शिक्षा

जो राजा अपनी प्रजा पर दया करता है, वह हमेशा सुखी रहता है। जो राजा अपनी प्रजा पर अत्याचार करता है, वह हमेशा दुखी रहता है।

सिंहासन बत्तीसी की पन्द्रवीं कहानी – “पुतली मदनवती की कथा”

एक राजा था, जिसका नाम था राजा वीरसेन। राजा वीरसेन बहुत ही दयालु और न्यायप्रिय थे। उनके राज्य में सभी लोग सुखी और समृद्ध थे। राजा वीरसेन के पास एक बहुत ही सुंदर बेटी थी, जिसका नाम था मदनवती। मदनवती बहुत ही बुद्धिमान और सुशील थी। वह नृत्य और संगीत में भी बहुत अच्छी थी।

एक दिन, राजा वीरसेन ने एक पुतली बनवाने का आदेश दिया। पुतली बनाने वाले ने बहुत ही सुंदर पुतली बनाई। पुतली की आंखें नीली थीं, बाल काले और लंबे थे, और चेहरा गुलाबी था। पुतली को देखकर राजा वीरसेन बहुत खुश हुए। उन्होंने पुतली का नाम मदनवती रखा।

मदनवती पुतली को राजकुमारी मदनवती से बहुत प्यार हो गया। वह हमेशा राजकुमारी मदनवती के साथ खेलती रहती थी। एक दिन, राजकुमारी मदनवती और मदनवती पुतली खेलते-खेलते एक गुफा में चली गईं। गुफा में एक राक्षस रहता था। राक्षस ने राजकुमारी मदनवती और मदनवती पुतली को देख लिया। उसने राजकुमारी मदनवती को पकड़ लिया और मदनवती पुतली को छोड़ दिया।

राजकुमारी मदनवती बहुत घबरा गई। उसने मदनवती पुतली से मदद मांगी। मदनवती पुतली ने राजकुमारी मदनवती को सलाह दी कि वह राक्षस से बात करे। राजकुमारी मदनवती ने राक्षस से बात की। उसने राक्षस से कहा कि वह उसे जाने दे। राक्षस ने राजकुमारी मदनवती से कहा कि वह उसे जाने देगा, लेकिन अगर वह उसकी शादी मदनवती पुतली से कर देगी।

राजकुमारी मदनवती बहुत दुखी हुई। वह मदनवती पुतली से बात करने लगी। उसने मदनवती पुतली से कहा कि वह उसे बचाने के लिए कुछ करे। मदनवती पुतली ने एक योजना बनाई। उसने राजकुमारी मदनवती से कहा कि वह राक्षस से कहे कि वह उसे शादी करने के लिए तैयार है, लेकिन उसे कुछ दिन का समय चाहिए।

राजकुमारी मदनवती ने राक्षस से कहा कि वह उसे शादी करने के लिए तैयार है, लेकिन उसे कुछ दिन का समय चाहिए। राक्षस राजकुमारी मदनवती की बात मान गया। उसने राजकुमारी मदनवती को कुछ दिन के लिए छोड़ दिया।

राजकुमारी मदनवती ने मदनवती पुतली से कहा कि वह एक जादू करे। मदनवती पुतली ने एक जादू किया। उस जादू से एक विशालकाय रावण प्रकट हुआ। रावण ने राक्षस को मार डाला और राजकुमारी मदनवती को बचा लिया।

राजा वीरसेन को जब यह पता चला कि राजकुमारी मदनवती को बचा लिया गया है, तो वह बहुत खुश हुए। उन्होंने मदनवती पुतली को धन्यवाद दिया। मदनवती पुतली ने राजकुमारी मदनवती और राजा वीरसेन को आशीर्वाद दिया।

राजकुमारी मदनवती और मदनवती पुतली हमेशा एक साथ खुशी-खुशी रहने लगीं।

कहानी का नैतिक: बुद्धि से हर समस्या का समाधान किया जा सकता है। दोस्ती हमेशा मददगार होती है। अच्छाई हमेशा बुराई पर जीतती है।

सिंहासन बत्तीसी की सोलहवीं कहानी – “पुतली सत्यवती की कथा”

एक समय की बात है, उज्जैन नगरी में राजा विक्रमादित्य का शासन था। राजा विक्रमादित्य अपने न्याय और बुद्धिमानी के लिए प्रसिद्ध थे। उनके दरबार में नौ विद्वानों की एक समिति थी, जो राजा को हर निर्णय लेने में मदद करती थी।

एक दिन, राजा विक्रमादित्य और उनकी समिति में ऐश्वर्य पर चर्चा चल रही थी। राजा ने कहा कि पाताल लोक के राजा शेषनाग का ऐश्वर्य देखने लायक है। उन्होंने अपनी समिति के सदस्यों को पाताल लोक जाने और वहां से चार रत्न लाने का आदेश दिया।

समिति के सदस्यों ने राजा का आदेश मानकर पाताल लोक की यात्रा की। वहां से उन्होंने चार रत्न प्राप्त किए। वे रत्न लेकर वापस उज्जैन लौट आए।

उज्जैन लौटने पर, राजा ने समिति के सदस्यों को धन्यवाद दिया और उनसे एक-एक रत्न चुनने को कहा। समिति के सदस्यों ने अपने परिवार के सदस्यों से सलाह लेने के बाद चारों रत्नों को राजा को ही भेंट कर दिया।

राजा विक्रमादित्य ने समिति के सदस्यों की उदारता की प्रशंसा की और उन्हें चारों रत्न वापस दे दिए। राजा ने कहा कि वह अपने प्रजा के साथ अपना धन साझा करना चाहते हैं।

उसी समय, एक ब्राह्मण राजा के दर्शन करने आया। ब्राह्मण ने राजा को बताया कि वह बहुत गरीब है और उसकी कोई संतान नहीं है। राजा ने ब्राह्मण को अपने पास बुलाया और उससे अपनी इच्छा बताने को कहा।

ब्राह्मण ने राजा से कहा कि वह अपने लिए एक रत्न चुनना चाहता है। राजा ने ब्राह्मण को चारों रत्नों में से एक चुनने के लिए कहा। ब्राह्मण असमंजस में पड़ गया। उसने राजा से कहा कि वह अपने परिवार के सदस्यों से सलाह लेने के बाद ही कोई निर्णय ले सकता है।

ब्राह्मण अपने घर गया और अपनी पत्नी, बेटे और बेटी से सलाह ली। पत्नी ने कहा कि उसे एक रत्न चाहिए जो उसे अमीर बना दे। बेटे ने कहा कि उसे एक रत्न चाहिए जो उसे शक्तिशाली बना दे। बेटी ने कहा कि उसे एक रत्न चाहिए जो उसे सुंदर बना दे।

ब्राह्मण फिर से राजा के पास गया। उसने राजा को बताया कि उसके परिवार के सभी सदस्यों ने अलग-अलग रत्नों की इच्छा जताई है। राजा विक्रमादित्य ने हंसते हुए कहा, “मैं तुम्हारी सभी इच्छाएं पूरी कर सकता हूं।”

राजा ने ब्राह्मण को चारों रत्नों को दे दिया। ब्राह्मण बहुत खुश हुआ। उसने राजा को धन्यवाद दिया और अपने घर वापस चला गया।

ब्राह्मण के घर पहुंचते ही, पत्नी ने उससे रत्नों को दिखाने के लिए कहा। ब्राह्मण ने रत्नों को पत्नी को दिखाए। पत्नी ने एक रत्न को अपने हाथ में लिया और उसे अपने तन पर पहन लिया। जैसे ही उसने रत्न को पहना, वह एक खूबसूरत महिला बन गई।

बेटे ने एक रत्न को अपने हाथ में लिया और उसे अपने सिर पर पहन लिया। जैसे ही उसने रत्न को पहना, वह एक शक्तिशाली योद्धा बन गया।

बेटी ने एक रत्न को अपने हाथ में लिया और उसे अपने गले में पहन लिया। जैसे ही उसने रत्न को पहना, वह एक धनी महिला बन गई।

ब्राह्मण बहुत खुश हुआ। उसने अपने परिवार को धन्यवाद दिया। ब्राह्मण और उसका परिवार खुशी-खुशी रहने लगा।

कहानी से सीख

दानशीलता

सत्यवती पुतली की कहानी से हमें दानशीलता का पाठ मिलता है। राजा विक्रमादित्य और समिति के सदस्यों ने दान की भावना का परिचय दिया। उन्होंने अपने धन और संपत्ति को दूसरों के साथ साझा किया।

एकता

कहानी से हमें एकता का भी पाठ मिलता है। राजा विक्रमादित्य और समिति के सदस्यों ने एकता का परिचय दिया। उन्होंने मिलकर पाताल लोक की यात्रा की और वहां से चार रत्न प्राप्त किए।

सिंहासन बत्तीसी की सत्रहवीं कहानी “पुतली जगत मोहिनी की कथा”

एक समय एक राजा था जिसका नाम चंद्रशेखर था। वह बहुत धनी और शक्तिशाली था, लेकिन उसके पास एक ही चिंता थी। उसका कोई पुत्र नहीं था। वह बहुत दुखी था क्योंकि वह अपने राज्य को अपने बाद किसी को नहीं सौंप सकता था।

एक दिन, एक साधु राजा के दरबार में आया। उसने राजा को बताया कि उसकी चिंता जल्द ही दूर हो जाएगी। उसने राजा को एक जादुई पुतली दी। साधु ने कहा कि यह पुतली बहुत ही सुंदर और बुद्धिमान है। वह राजा के लिए एक आदर्श पुत्री होगी।

राजा बहुत खुश हुआ। उसने पुतली का नाम जगत मोहिनी रखा। जगत मोहिनी बहुत ही सुंदर और बुद्धिमान थी। वह जल्द ही राजा की सबसे प्यारी संतान बन गई।

एक दिन, एक राजा ने चंद्रशेखर के राज्य पर हमला कर दिया। चंद्रशेखर युद्ध में घायल हो गया और उसे अपनी जान बचाने के लिए भागना पड़ा। जगत मोहिनी ने अपने पिता का बचाव करने के लिए फैसला किया।

जगत मोहिनी ने अपने पिता के कपड़े पहने और युद्ध के मैदान में उतरी। उसने दुश्मनों को पराजित किया और अपने पिता को बचा लिया।

चंद्रशेखर जगत मोहिनी की वीरता से बहुत प्रभावित हुए। उन्होंने जगत मोहिनी को अपने राज्य का राजा घोषित कर दिया। जगत मोहिनी एक महान शासक बनी। उसने अपने राज्य को समृद्ध और शक्तिशाली बनाया।

जगत मोहिनी की कहानी एक प्रेरणादायक कहानी है। यह बताती है कि एक स्त्री भी एक पुरुष के समान वीर और शक्तिशाली हो सकती है।

सिंहासन बत्तीसी की अठारहवीं कहानी – “पुतली तारामती की कथा”

सिंहासन बत्तीसी की अठारहवीं कहानी है “पुतली तारामती की कथा”। इस कहानी में बताया गया है कि कैसे राजा विक्रमादित्य ने एक विद्वान की कहानी सुनकर विश्वासघात के बुरे परिणामों को समझा।

एक दिन, राजा विक्रमादित्य के दरबार में दक्षिण भारत से एक विद्वान आया। विद्वान ने राजा को बताया कि विश्वासघात विश्व का सबसे नीच कर्म है। उसने राजा को विश्वासघात के बुरे परिणामों की एक कहानी सुनाई।

कहानी

एक समय की बात है, एक राज्य में एक राजा था। वह बहुत ही क्रूर और अत्याचारी था। वह अपने प्रजा पर अत्याचार करता था। एक दिन, एक चित्रकार ने राजा की एक तस्वीर बनाई। चित्रकार ने राजा की तस्वीर में एक छोटा सा तिल भी दिखाया। राजा को यह तिल बहुत बुरा लगा। उसने चित्रकार को बुलाया और कहा, “तुमने मेरी तस्वीर में तिल क्यों दिखाया है? यह तिल मेरी सुंदरता को खराब कर रहा है।”

चित्रकार ने कहा, “महाराज, मैं एक कलाकार हूं। मैं अपनी कला में सच्चाई को दिखाता हूं। आपकी तस्वीर में तिल है, इसलिए मैंने उसे दिखाया है।”

राजा को चित्रकार की बात बिल्कुल भी पसंद नहीं आई। उसने जल्लादों को बुलाया और चित्रकार को मारने का आदेश दिया। जल्लादों ने चित्रकार की गर्दन उड़ा दी और उसकी आंखें निकालकर राजा के सामने पेश कीं।

राजा चित्रकार की आंखें देखकर बहुत खुश हुआ। उसने कहा, “अब मैं चित्रकार को कभी नहीं देखूंगा। वह मेरी आंखों में कभी नहीं आएगा।”

कुछ दिनों बाद, राजा को एक सपना आया। सपने में उसने चित्रकार को देखा। चित्रकार ने राजा से कहा, “महाराज, आपने मुझे बहुत बड़ा अपराध किया है। आपने एक कलाकार को सिर्फ इसलिए मार दिया क्योंकि उसने आपकी तस्वीर में एक तिल दिखाया था। आपका यह अपराध कभी भी नहीं भुलाया जाएगा।”

राजा सपने से जाग गया। उसे बहुत पछतावा हुआ। उसने विद्वान को बुलाया और उससे कहा, “मैंने चित्रकार को मारकर बहुत बड़ा अपराध किया है। मैं उसके अपराध के लिए उसे माफ करना चाहता हूं।”

विद्वान ने राजा को समझाया कि विश्वासघात का कोई भी परिणाम अच्छा नहीं होता है। विश्वासघात करने वाले व्यक्ति को हमेशा पछताना पड़ता है।

राजा विद्वान की बात मान गया। उसने चित्रकार के परिवार को मुआवजा दिया और चित्रकार की आत्मा की शांति के लिए पूजा करवाई।

कथा का सार

यह कहानी हमें विश्वासघात के बुरे परिणामों के बारे में बताती है। विश्वासघात करने वाले व्यक्ति को हमेशा पछताना पड़ता है। इसलिए, हमें कभी भी किसी पर विश्वासघात नहीं करना चाहिए।

सिंहासन बत्तीसी की उन्नीसवीं कहानी – “पुतली प्रियदर्शनी की कथा”

एक समय की बात है, उज्जैन नगर में एक राजा विक्रमादित्य राज्य करते थे। वे बहुत ही बुद्धिमान और न्यायप्रिय राजा थे। उनके दरबार में कई विद्वान और कलाकार रहते थे। एक दिन, राजा विक्रमादित्य ने अपने दरबार में एक सुंदर पुतली को रखा। पुतली का नाम प्रियदर्शनी था। प्रियदर्शनी बहुत ही सुंदर और गुणवान थी। वह सभी को अपनी ओर आकर्षित करती थी।

एक दिन, राजा विक्रमादित्य ने अपने दरबारियों से कहा, “मैंने इस पुतली को अपने दरबार में इसलिए रखा है ताकि वह सभी को प्रसन्न कर सके। मैं चाहता हूं कि वह सभी को अपनी ओर आकर्षित करे।”

दरबारियों ने राजा की बात का समर्थन किया। वे सभी प्रियदर्शनी की सुंदरता और गुणों से प्रभावित थे। वे चाहते थे कि प्रियदर्शनी हमेशा उनके साथ रहे।

प्रियदर्शनी भी राजा और उनके दरबारियों से बहुत प्यार करती थी। वह हमेशा सभी को खुश रखने की कोशिश करती थी। वह सभी के साथ बहुत ही मिलनसार और दयालु थी।

एक दिन, एक व्यापारी उज्जैन नगर आया। वह बहुत ही अमीर था। वह राजा विक्रमादित्य से मिलने आया था। व्यापारी ने राजा से कहा, “मैं आपकी पुतली प्रियदर्शनी को खरीदना चाहता हूं। मैं उसे बहुत महंगे दाम पर खरीदूंगा।”

राजा विक्रमादित्य ने व्यापारी की बात सुनकर कहा, “मेरी पुतली प्रियदर्शनी एक अमूल्य रत्न है। मैं उसे किसी भी कीमत पर नहीं बेच सकता।”

व्यापारी राजा विक्रमादित्य की बात से बहुत नाराज हुआ। वह राजा से बोला, “आप बहुत ही मूर्ख राजा हैं। आप इस पुतली को बेचकर बहुत सारा धन कमा सकते हैं। लेकिन आप उसे बेचने से मना कर रहे हैं।”

व्यापारी की बातों से राजा विक्रमादित्य को बहुत गुस्सा आया। उन्होंने व्यापारी से कहा, “तुम बहुत ही अहंकारी हो। मैं तुम्हें इस पुतली को नहीं बेचूंगा।”

व्यापारी बहुत गुस्सा हो गया। उसने राजा विक्रमादित्य को धमकी दी कि वह उज्जैन नगर को नष्ट कर देगा।

राजा विक्रमादित्य ने व्यापारी से कहा, “तुम उज्जैन नगर को नष्ट नहीं कर सकते। मैं तुम्हारा सामना करने के लिए तैयार हूं।”

व्यापारी राजा विक्रमादित्य से लड़ने के लिए तैयार हो गया। दोनों में भयंकर युद्ध हुआ। अंत में, राजा विक्रमादित्य ने व्यापारी को हराकर उसे बंदी बना लिया।

राजा विक्रमादित्य ने व्यापारी को समझाया कि उसे प्रियदर्शनी को नहीं खरीदना चाहिए। व्यापारी ने राजा विक्रमादित्य की बात मान ली। उसने राजा से माफी मांगी और उज्जैन नगर से चला गया।

राजा विक्रमादित्य ने प्रियदर्शनी को अपने दरबार में रख लिया। प्रियदर्शनी हमेशा राजा और उनके दरबारियों की खुशी का कारण बनी रही।

कहानी का निष्कर्ष

इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि हमें किसी भी चीज को अंधाधुंध नहीं खरीदना चाहिए। हमें पहले उस चीज के बारे में पूरी जानकारी लेनी चाहिए। हमें अहंकार नहीं करना चाहिए। हमें हमेशा दूसरों की मदद करनी चाहिए।

सिंहासन बत्तीसी की बीसवीं कहानी – “पुतली मदनमोहिनी की कथा”

एक समय की बात है, राजा विक्रमादित्य के दरबार में एक बुद्धिमान और गुणी युवक रहता था। उसका नाम था, “वसंतकुमार”। वसंतकुमार बहुत ही विद्वान था और उसे सभी कला और शास्त्रों का ज्ञान था। वह बहुत ही सुंदर भी था और उसकी आवाज बहुत ही मधुर थी।

एक दिन राजा विक्रमादित्य ने अपने दरबार में एक प्रतियोगिता का आयोजन किया। इस प्रतियोगिता में सभी कलाकारों को बुलाया गया था। प्रतियोगिता का विषय था, “एक ऐसी पुतली बनाना जो कि देखने में सुंदर हो, उसकी आवाज मधुर हो और वह सभी प्रकार के कार्यों को कर सके”।

वसंतकुमार ने इस प्रतियोगिता में भाग लिया और उसने एक ऐसी पुतली बनाई जो कि देखने में बहुत ही सुंदर थी। उसकी आवाज बहुत ही मधुर थी और वह सभी प्रकार के कार्यों को कर सकती थी।

वसंतकुमार की पुतली को सभी ने बहुत पसंद किया और वह इस प्रतियोगिता में विजयी हुई। राजा विक्रमादित्य ने वसंतकुमार को इस पुतली के लिए एक इनाम दिया और उसे अपने दरबार में रख लिया।

वसंतकुमार ने अपनी पुतली का नाम “मदनमोहिनी” रखा। मदनमोहिनी बहुत ही सुंदर और गुणी थी। उसकी आवाज इतनी मधुर थी कि उसे सुनकर सभी मोहित हो जाते थे। वह सभी प्रकार के कार्यों को बहुत ही कुशलता से करती थी।

मदनमोहिनी राजा विक्रमादित्य के दरबार की शोभा बढ़ाने लगी। वह राजा के साथ सभी समारोहों में जाती थी और सभी को अपना मुग्ध कर लेती थी।

एक दिन राजा विक्रमादित्य मदनमोहिनी के साथ एक वन में घूम रहे थे। तभी रास्ते में उन्हें एक ऋषि मिले। ऋषि ने राजा से कहा, “महाराज, आपके दरबार में एक ऐसी पुतली है जो कि बहुत ही सुंदर और गुणी है। उसकी आवाज इतनी मधुर है कि उसे सुनकर सभी मोहित हो जाते हैं। मैं यह पुतली देखना चाहता हूं।”

राजा ने ऋषि को मदनमोहिनी से मिलवाया। ऋषि ने मदनमोहिनी को देखा और उसकी सुंदरता और गुणों से बहुत प्रभावित हुए। ऋषि ने मदनमोहिनी से कहा, “तुम बहुत ही सुंदर और गुणी हो। तुम्हारी आवाज इतनी मधुर है कि मुझे लगता है कि तुम किसी देवता की पुत्री हो।”

मदनमोहिनी ने ऋषि से कहा, “ऋषिवर, मैं एक सामान्य युवक की पुत्री हूं। मैं कोई देवता की पुत्री नहीं हूं।”

ऋषि ने कहा, “नहीं बेटी, तुम कोई सामान्य युवक की पुत्री नहीं हो। तुम एक देवता की पुत्री हो। मैं तुम्हें तुम्हारे माता-पिता के पास ले जाऊंगा।”

ऋषि ने मदनमोहिनी को अपने साथ ले जाने की कोशिश की, लेकिन वसंतकुमार ने उन्हें रोक दिया। वसंतकुमार ने कहा, “ऋषिवर, यह मेरी पुतली है। मैं इसे आपके साथ नहीं जाने दूंगा।”

ऋषि ने कहा, “बेटा, यह तुम्हारी पुतली नहीं है। यह एक देवता की पुत्री है। इसे मेरे साथ जाना ही होगा।”

ऋषि और वसंतकुमार के बीच बहस होने लगी। बहस इतनी बढ़ गई कि दोनों में लड़ाई होने लगी। लड़ाई में वसंतकुमार को चोट लग गई।

ऋषि ने वसंतकुमार को चोट लगी देखी तो उसे बहुत दुख हुआ। उसने कहा, “बेटा, मुझे माफ़ करना। मैं तुम्हारी पुतली नहीं ले जाऊंगा।”

ऋषि ने मदनमोहिनी को वसंतकुमार को सौंप दिया और चले गए।

वसंतकुमार ने मदनमोहिनी को बहुत प्यार से गले लगाया। वह बहुत खुश था कि मदनमोहिनी उसके साथ रह गई।

मदनमोहिनी और वसंतकुमार हमेशा एक दूसरे से प्यार करते रहे और उन्होंने अपना जीवन बहुत खुशी से बिताया।

सिंहासन बत्तीसी की इक्कीसवीं कहानी – “पुतली विद्यावती की कथा”

सिंहासन बत्तीसी की सत्रहवीं कहानी है पुतली विद्यावती की कथा। इस कहानी में, राजा भोज को एक पुतली विद्यावती द्वारा राजा विक्रमादित्य की एक कहानी सुनाई जाती है।

एक बार, राजा विक्रमादित्य अपने राज्य का भ्रमण कर रहे थे। जब वे एक गाँव में पहुँचे, तो उन्होंने एक साधु और उसकी पत्नी को देखा। साधु और उसकी पत्नी बहुत दुखी थे। उन्होंने राजा विक्रमादित्य को बताया कि वे कई वर्षों से संतान के लिए प्रार्थना कर रहे हैं, लेकिन उन्हें कोई संतान नहीं हुई है।

राजा विक्रमादित्य ने साधु और उसकी पत्नी की बात सुनकर दुख हुआ। उन्होंने साधु और उसकी पत्नी से कहा कि वे उनकी मदद करेंगे। राजा विक्रमादित्य ने एक हवन कुंड बनाया और उसमें अपने अंग काटकर फेंकने शुरू कर दिए।

जब साधु और उसकी पत्नी ने यह देखा, तो वे बहुत आश्चर्यचकित हुए। उन्होंने राजा विक्रमादित्य से ऐसा क्यों कर रहे हैं, यह पूछा। राजा विक्रमादित्य ने उन्हें बताया कि वे भगवान शिव को प्रसन्न करना चाहते हैं। वे चाहते हैं कि भगवान शिव उनकी प्रार्थना सुनें और उन्हें संतान प्रदान करें।

कई दिनों तक राजा विक्रमादित्य अपने अंग काटकर हवन कुंड में डालते रहे। अंत में, भगवान शिव प्रसन्न हुए। उन्होंने राजा विक्रमादित्य को दर्शन दिए और उन्हें वरदान दिया कि उन्हें एक पुत्र होगा।

कुछ समय बाद, साधु और उसकी पत्नी को एक पुत्र हुआ। वे बहुत खुश हुए। उन्होंने राजा विक्रमादित्य को अपना आभार व्यक्त किया।

पुतली विद्यावती ने राजा भोज को यह कहानी सुनाकर उन्हें यह संदेश दिया कि राजा विक्रमादित्य ने अपनी प्रजा के लिए अपने प्राणों की बाजी लगा दी थी। उन्होंने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए अपने अंग काटकर हवन कुंड में डाले थे। राजा भोज को भी ऐसे गुणों का विकास करना चाहिए ताकि वे एक योग्य राजा बन सकें।

राजा भोज ने पुतली विद्यावती की बात मान ली। उन्होंने संकल्प लिया कि वे एक महान राजा बनेंगे और अपनी प्रजा के लिए सब कुछ करेंगे।

कहानी का सार

पुतली विद्यावती की कथा में हमें यह संदेश दिया गया है कि एक अच्छे राजा के लिए त्याग और बलिदान की भावना आवश्यक है। एक अच्छे राजा को अपनी प्रजा के लिए सब कुछ करना चाहिए। उन्हें अपनी प्रजा के कल्याण के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर देना चाहिए।

सिंहासन बत्तीसी की बाइसवीं कहानी – “पुतली चंद्रज्योति की कथा”

एक बार की बात है, उज्जैन में राजा विक्रमादित्य राज्य करते थे। वे एक महान राजा थे और उनकी प्रजा उनसे बहुत प्यार करती थी। राजा विक्रमादित्य हमेशा अपनी प्रजा की भलाई के लिए सोचते थे।

एक दिन, राजा विक्रमादित्य ने सोचा कि वह राज्य में एक यज्ञ कराना चाहते हैं। वह चाहते थे कि यज्ञ में सभी देवता उपस्थित हों। इसलिए, उन्होंने अपने महामंत्री को चंद्र देव को बुलाने के लिए भेजा।

महामंत्री चंद्र देव के दरबार में गए और उन्हें यज्ञ में आने का निमंत्रण दिया। चंद्र देव ने निमंत्रण स्वीकार कर लिया और वे यज्ञ में आने के लिए तैयार हो गए।

चंद्र देव के आने की खबर सुनकर राजा विक्रमादित्य बहुत खुश हुए। उन्होंने यज्ञ की तैयारियों में लग गए। उन्होंने यज्ञ स्थल को बहुत सुंदर सजाया और यज्ञ में उपयोग होने वाले सभी सामानों की व्यवस्था की।

यज्ञ के दिन, राजा विक्रमादित्य और उनकी प्रजा ने चंद्र देव के आने का इंतजार किया। कुछ देर बाद, चंद्र देव यज्ञ स्थल पर पहुंचे। उन्होंने राजा विक्रमादित्य और उनकी प्रजा को आशीर्वाद दिया।

यज्ञ में राजा विक्रमादित्य ने चंद्र देव को बहुत सारे उपहार दिए। चंद्र देव राजा विक्रमादित्य की उदारता से बहुत खुश हुए।

यज्ञ समाप्त होने के बाद, चंद्र देव राजा विक्रमादित्य से कुछ और उपहार देने के लिए कहा। राजा विक्रमादित्य ने चंद्र देव से पूछा कि उन्हें क्या चाहिए।

चंद्र देव ने कहा, “मैं तुमसे एक ऐसी पुतली मांगता हूं जो बहुत ही सुंदर और बुद्धिमान हो।”

राजा विक्रमादित्य ने चंद्र देव को एक बहुत ही सुंदर और बुद्धिमान पुतली दी। चंद्र देव पुतली को देखकर बहुत खुश हुए। उन्होंने राजा विक्रमादित्य को आशीर्वाद दिया और वहां से चले गए।

राजा विक्रमादित्य ने पुतली का नाम चंद्रज्योति रखा। चंद्रज्योति बहुत ही सुंदर और बुद्धिमान थी। वह राजा विक्रमादित्य की बहुत अच्छी दोस्त बन गई।

एक दिन, राजा विक्रमादित्य ने चंद्रज्योति से पूछा, “तुम इस दुनिया में क्यों आई?”

चंद्रज्योति ने कहा, “मैं इस दुनिया में लोगों की मदद करने के लिए आई हूं। मैं चाहती हूं कि सभी लोग सुखी और खुशहाल रहें।”

राजा विक्रमादित्य चंद्रज्योति की बातों से बहुत प्रभावित हुए। उन्होंने चंद्रज्योति को अपनी राजकुमारी बना लिया।

चंद्रज्योति ने राजा विक्रमादित्य के साथ मिलकर राज्य की बहुत सेवा की। उन्होंने राज्य में सुख, शांति और समृद्धि स्थापित की।

चंद्रज्योति की कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि हमें दूसरों की मदद करने के लिए हमेशा तैयार रहना चाहिए।

सिंहासन बत्तीसी की तेईसवीं कहानी – “पुतली ज्ञानवती की कथा”

एक समय की बात है, एक राज्य में राजा विक्रमादित्य राज्य करते थे। वे एक बहुत ही पराक्रमी और न्यायप्रिय राजा थे। उनके दरबार में ज्ञानियों, विद्वानों और कलाकारों का सम्मान किया जाता था।

एक दिन राजा विक्रमादित्य जंगल में भ्रमण कर रहे थे। रास्ते में उन्होंने दो लोगों की बातें सुनी। उनमें से एक ज्योतिषी था। ज्योतिषी कह रहा था कि ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, राजा-महाराजाओं के पैरों पर कमल का निशान होता है। लेकिन, जंगल में एक लकड़हारे के पैरों पर भी कमल का निशान है।

राजा विक्रमादित्य को यह बात सुनकर आश्चर्य हुआ। उन्होंने तुरंत उस लकड़हारे को बुलवाया। जब लकड़हारे ने अपने पैर दिखाए तो राजा विक्रमादित्य भी दंग रह गए। लकड़हारे के पैरों पर वास्तव में कमल का निशान था।

राजा विक्रमादित्य ने उस लकड़हारे से उसका परिचय पूछा। लकड़हारे ने बताया कि उसका जन्म एक लकड़हारे के घर हुआ था और वह कई पीढ़ियों से यही काम कर रहा था।

राजा विक्रमादित्य को विश्वास नहीं हुआ कि एक साधारण लकड़हारे के पैरों पर राजा-महाराजाओं के समान निशान कैसे हो सकते हैं। उन्होंने ज्योतिषी से इस बारे में पूछा।

ज्योतिषी ने बताया कि यह एक चमत्कार है। निश्चित रूप से उस लकड़हारे का जन्म किसी राजघराने में हुआ होगा। लेकिन, किसी कारणवश वह लकड़हारे का काम कर रहा है।

राजा विक्रमादित्य ने उस लकड़हारे को अपने दरबार में बुलाया और उसे एक ऊंचे पद पर नियुक्त किया। लकड़हारे का नाम ज्ञानवती था। वह बहुत ही बुद्धिमान और गुणवान था। उसने राजा विक्रमादित्य के राज्य को बहुत समृद्ध बनाया।

ज्ञानवती ने अपनी बुद्धिमत्ता और दयालुता से सभी का दिल जीता। वह राजा विक्रमादित्य की सबसे प्रिय पुतली बन गई।

कहानी से सीख

इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि हमें कभी भी किसी के बाहरी रूप से उसकी योग्यता का अंदाजा नहीं लगाना चाहिए। किसी भी व्यक्ति में छिपी हुई प्रतिभा को पहचानना और उसे उभारना जरूरी है।

इस कहानी में लकड़हारे ज्ञानवती के रूप में एक साधारण व्यक्ति में राजा-महाराजाओं के समान गुणों का पता चला। राजा विक्रमादित्य ने उसकी प्रतिभा को पहचाना और उसे एक ऊंचे पद पर नियुक्त किया। इससे ज्ञानवती ने अपने जीवन में सफलता प्राप्त की।

सिंहासन बत्तीसी की चौबीसवीं कहानी – “पुतली अनुरोधवती की कथा”

एक समय की बात है, जब राजा विक्रमादित्य की सभा में एक पुतली आती है। वह पुतली कहती है कि मैं तुम्हें एक कहानी सुनाऊंगी। अगर उसकी कहानी सत्य निकली, तो तुम राजा बनने के योग्य हो। अगर उसकी कहानी झूठी निकली, तो तुम कभी भी राजा नहीं बन पाओगे।

राजा विक्रमादित्य पुतली की बात मानने के लिए तैयार हो जाते हैं। पुतली कहती है कि एक बार की बात है, एक राजा था जिसका नाम राजा वीरसेन था। वह राजा बहुत ही गुणी और प्रजावत्सल था। उसकी प्रजा उससे बहुत प्यार करती थी।

एक दिन, राजा वीरसेन अपने दरबार में बैठे थे। तभी एक साधु आया और बोला, “महाराज, मैं आपसे एक वरदान मांगना चाहता हूं।”

राजा वीरसेन ने कहा, “कहिए, साधुराज, मैं आपका हर वरदान दे दूंगा।”

साधु ने कहा, “महाराज, मैं चाहता हूं कि आपके राज्य में कभी भी कोई दुख या संकट न आए।”

राजा वीरसेन ने कहा, “यह तो बहुत ही आसान वरदान है। मैं आपको यह वरदान देता हूं।”

साधु ने कहा, “महाराज, धन्यवाद। मैं आपके राज्य को आशीर्वाद देता हूं।”

साधु के जाते ही, राजा वीरसेन के राज्य में सब कुछ बहुत अच्छा रहने लगा। कभी भी कोई दुख या संकट नहीं आया। प्रजा बहुत खुश थी।

एक दिन, राजा वीरसेन अपने पुत्र के साथ जंगल में घूम रहे थे। तभी उन्होंने एक पेड़ के नीचे बैठी एक सुंदर युवती को देखा। राजा वीरसेन ने युवती से पूछा, “तुम कौन हो और यहां क्या कर रही हो?”

युवती ने कहा, “मैं एक अप्सरा हूं। मैं यहां अपने माता-पिता से मिलने आई थी।”

राजा वीरसेन ने युवती से प्रेम कर लिया। उन्होंने युवती से शादी कर ली।

राजा वीरसेन और अप्सरा के दो पुत्र हुए। दोनों पुत्र बहुत ही सुंदर और गुणी थे।

एक दिन, राजा वीरसेन की मृत्यु हो गई। उनके बड़े पुत्र को राजा बनाया गया।

राजा के बड़े पुत्र का नाम राजा विक्रमादित्य था। राजा विक्रमादित्य भी अपने पिता की तरह ही गुणी और प्रजावत्सल थे। उनकी प्रजा उनसे बहुत प्यार करती थी।

एक दिन, राजा विक्रमादित्य अपने दरबार में बैठे थे। तभी एक साधु आया और बोला, “महाराज, मैं आपसे एक वरदान मांगना चाहता हूं।”

राजा विक्रमादित्य ने कहा, “कहिए, साधुराज, मैं आपका हर वरदान दे दूंगा।”

साधु ने कहा, “महाराज, मैं चाहता हूं कि आपके राज्य में हमेशा शांति और समृद्धि बनी रहे।”

राजा विक्रमादित्य ने कहा, “यह तो बहुत ही आसान वरदान है। मैं आपको यह वरदान देता हूं।”

साधु ने कहा, “महाराज, धन्यवाद। मैं आपके राज्य को आशीर्वाद देता हूं।”

साधु के जाते ही, राजा विक्रमादित्य के राज्य में सब कुछ बहुत अच्छा रहने लगा। कभी भी कोई दुख या संकट नहीं आया। प्रजा बहुत खुश थी।

पुतली की कहानी सुनकर राजा विक्रमादित्य बहुत खुश हुए। उन्होंने कहा, “पुतली, तुम्हारी कहानी सत्य निकली। मैं राजा बनने के योग्य हूं।”

राजा विक्रमादित्य ने पुतली को बहुत सारे धन और आभूषण दिए। पुतली ने राजा विक्रमादित्य को आशीर्वाद दिया और वहां से चली गई।

राजा विक्रमादित्य ने अपने राज्य में बहुत अच्छा शासन किया। उन्होंने अपने राज्य को समृद्ध और सुखी बनाया। उनकी प्रजा उन्हें बहुत प्यार करती थी।

कहानी का नैतिक

इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि अगर हम सच्चे और ईमानदार हैं, तो हमें सफलता जरूर मिलती है।

सिंहासन बत्तीसी की पच्चीसवीं कहानी – “पुतली करुणावती की कथा”

सिंहासन बत्तीसी की पच्चीसवीं कहानी पुतली करुणावती की कथा है। यह कहानी राजा विक्रमादित्य की न्यायप्रियता और चरित्रहीन स्त्रियों से प्रेम की हानीकारकता की शिक्षा देती है।

एक बार राजा विक्रमादित्य अपनी प्रजा का हालचाल जानने के लिए रात में भेष बदलकर घूम रहे थे। तभी उन्हें एक बड़े भवन से लटकता हुआ एक कमन्द नज़र आया। वे कमन्द के सहारे ऊपर पहुंचे और एक कमरे में दाखिल हुए। कमरे में एक युवक और एक युवती बैठे थे। युवक के हाथ में एक नौलखा हार था।

युवक ने युवती से कहा, “यह नौलखा हार तुम्हारे लिए है। मैं इसे तुम्हें बहुत प्यार करता हूँ।”

युवती ने नौलखा हार देखकर खुशी से झूम उठी। उसने युवक से कहा, “मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकती। अगर तुमने मुझे नौलखा हार नहीं दिया होता, तो मैं तुम्हारी हत्या कर देती।”

राजा विक्रमादित्य यह सुनकर हैरान रह गए। उन्होंने युवक से कहा, “तुम्हारी प्रेमिका तुम्हारे साथ इतनी क्रूरता कैसे कर सकती है?”

युवक ने जवाब दिया, “मैं इसे समझ नहीं पाया। वह पहले तो बहुत प्यारी थी। लेकिन नौलखा हार मिलने के बाद वह बदल गई।”

राजा विक्रमादित्य ने युवक को समझाया, “सच्ची प्रेमिका प्रेमी से प्रेम करती है, उसकी दौलत से नहीं। तुम्हारी प्रेमिका एक चरित्रहीन स्त्री है। ऐसी स्त्रियों से प्रेम हमेशा विनाश की ओर ले जाता है।”

राजा विक्रमादित्य ने युवक को युवती से दूर रहने की सलाह दी। युवक ने राजा की सलाह मान ली।

राजा विक्रमादित्य ने युवक को नौलखा हार भी वापस दे दिया। युवक राजा विक्रमादित्य का आभारी था। उसने राजा से कहा, “मैं आपका जीवन भर आभारी रहूँगा। आपने मुझे एक चरित्रहीन स्त्री से बचाया।”

राजा विक्रमादित्य ने युवक को आशीर्वाद दिया और वहाँ से चले गए।

कहानी का सार

इस कहानी से यह शिक्षा मिलती है कि हमें चरित्रहीन स्त्रियों से प्रेम नहीं करना चाहिए। ऐसी स्त्रियाँ हमेशा अपने प्रेमियों को हानि पहुँचाती हैं।

सिंहासन बत्तीसी की छब्बीसवीं कहानी – “पुतली धर्मवती की कथा”

राजा भोज एक बार अपने दरबार में बैठे हुए थे। उनके साथ उनके मंत्री और दरबारी भी बैठे हुए थे। राजा भोज और उनके दरबारियों के बीच एक बातचीत छिड़ गई कि मनुष्य जन्म से बड़ा होता है या कर्म से। एक गुट का मानना था कि मनुष्य जन्म से बड़ा होता है। उनका तर्क था कि मनुष्य का जन्म उसके पूर्वजन्मों के कर्मों का फल होता है। अच्छे परिवार में पैदा हुए व्यक्ति अच्छे संस्कार वाले होते हैं। इसलिए, वे अच्छे कर्म करने की संभावना रखते हैं। दूसरे गुट का मानना था कि कर्म ही प्रधान है। उनका तर्क था कि कोई भी व्यक्ति चाहे किसी भी परिवार में पैदा हुआ हो, वह अपने कर्मों के अनुसार ही बड़ा होता है। अच्छे परिवार में पैदा हुआ व्यक्ति भी बुरी संगत में पड़कर बुरे कर्म कर सकता है।

राजा भोज ने अपने दरबारियों को समझाया कि मनुष्य में मूल प्रवृत्तियाँ होती हैं। ये प्रवृत्तियाँ जन्म से ही मौजूद होती हैं। अवसर पाकर ये प्रवृत्तियाँ स्वतः ही उजागर हो जाती हैं। जैसे एक शेर का बच्चा जन्म से ही शेर होता है। वह बकरियों के बीच भी शेर की ही तरह रहना और व्यवहार करना पसंद करता है।

राजा भोज ने अपने दरबारियों को एक कहानी सुनाई। एक जंगल में एक शेर का बच्चा रहता था। एक दिन वह जंगल में भटकता हुआ एक झुंड बकरियों के पास पहुंच गया। बकरियों ने उसे देखा तो डरकर भागने लगीं। शेर का बच्चा भी उनका पीछा करने लगा। वह भी बकरियों की तरह ही दौड़ता था।

शेर के बच्चों को देखकर जंगल के राजा ने सोचा कि यह शेर का बच्चा बहुत कमजोर है। इसलिए, वह इसे अपने झुंड में शामिल कर लेता है। राजा ने शेर के बच्चे को बकरियों के साथ ही रहने और उनके साथ ही भोजन करने की आज्ञा दी। शेर का बच्चा राजा की आज्ञा का पालन करने लगा। वह बकरियों के साथ ही रहने और भोजन करने लगा।

कुछ दिनों बाद, एक शिकारी जंगल में शिकार करने आया। उसने बकरियों के झुंड को देखा और उन पर निशाना लगाया। शिकारी का तीर शेर के बच्चे के पास जाकर गिरा। शेर का बच्चा तीर को देखकर डर गया। वह भागने लगा।

शेर का बच्चा भागते-भागते एक जंगल में जा पहुंचा। उस जंगल में एक जंगली शेर रहता था। जंगली शेर ने शेर के बच्चे को देखा तो उसे अपने झुंड में शामिल कर लिया। जंगली शेर ने शेर के बच्चे को शेर की तरह ही रहना और व्यवहार करना सिखाया।

कुछ दिनों बाद, जंगल में एक शेरनी आई। शेरनी ने शेर के बच्चे को देखा तो उसे अपना बेटा समझ लिया। शेरनी ने शेर के बच्चे को अपने साथ ले जाकर जंगल के राजा के पास ले गई। जंगल के राजा ने शेर के बच्चे को पहचान लिया। उन्होंने शेर के बच्चे को अपने झुंड में वापस ले लिया।

शेर का बच्चा अब शेर की तरह ही रहने और व्यवहार करने लगा। वह बकरियों के साथ नहीं रहना चाहता था। वह शेरों के साथ रहना चाहता था।

राजा भोज ने अपने दरबारियों को कहा कि इस कहानी से यह पता चलता है कि मनुष्य में मूल प्रवृत्तियाँ जन्म से ही होती हैं। अवसर पाकर ये प्रवृत्तियाँ स्वतः ही उजागर हो जाती हैं। इसलिए, किसी व्यक्ति का सम्मान उसके कर्मों के अनुसार करना चाहिए, न कि उसके जन्म के अनुसार।

सिंहासन बत्तीसी की सत्‍ताइसवीं कहानी – “पुतली जयलक्ष्मी की कथा

“सिंहासन बत्तीसी” एक प्राचीन भारतीय कहानी संग्रह है जिसमें 32 पुतलियों की कहानियां हैं। ये कहानियां राजा विक्रमादित्य के दरबार में घटी घटनाओं पर आधारित हैं।

एक बार की बात है, राजा विक्रमादित्य अपने राज्य में भ्रमण कर रहे थे। रास्ते में उन्हें एक जंगल में एक सुंदर हिरण दिखाई दिया। राजा को हिरण बहुत पसंद आया और उन्होंने उसे मारने के लिए धनुष उठाया। लेकिन जैसे ही उन्होंने धनुष तानने की कोशिश की, हिरण ने मनुष्य की आवाज में कहा, “महाराज, मुझे मारो मत। मैं एक राजकुमार हूं। मुझे एक दुष्ट राक्षस ने शाप दिया है कि मैं हिरण का रूप धारण कर लूंगा। अगर आप मुझे मार देंगे तो यह शाप हमेशा के लिए रहेगा।”

राजा विक्रमादित्य को हिरण की बात पर विश्वास नहीं हुआ। उन्होंने कहा, “तुम झूठ बोल रहे हो। तुम एक साधारण हिरण हो।”

हिरण ने कहा, “महाराज, मेरा कहना सच है। आप चाहें तो इस बात की जांच कर सकते हैं।”

राजा विक्रमादित्य हिरण की बात मानने के लिए तैयार नहीं थे। उन्होंने धनुष से तीर चला दिया और हिरण को मार डाला।

हिरण की मृत्यु के बाद, राजा विक्रमादित्य को बहुत पछतावा हुआ। उन्होंने महसूस किया कि उन्होंने एक निर्दोष जीव की हत्या कर दी है। उन्होंने हिरण की आत्मा की शांति के लिए तपस्या की।

तपस्या के प्रभाव से, हिरण की आत्मा राजा विक्रमादित्य के सामने प्रकट हुई। हिरण ने राजा से कहा, “महाराज, आपने मुझे मार डाला, लेकिन मैंने आपको माफ कर दिया है। लेकिन मैं आपको एक शर्त पर माफ करूंगा। आपको मुझे एक पुतली का रूप देना होगा और मुझे अपने महल में रखना होगा।”

राजा विक्रमादित्य ने हिरण की शर्त मान ली। उन्होंने हिरण को एक पुतली का रूप दिया और उसे अपने महल में रख लिया। पुतली का नाम जयलक्ष्मी रखा गया।

जयलक्ष्मी एक बहुत ही सुंदर और बुद्धिमान पुतली थी। वह राजा विक्रमादित्य की बहुत अच्छी दोस्त बन गई। वह राजा को हमेशा अच्छी सलाह देती थी।

एक दिन, एक दुष्ट राजा ने राजा विक्रमादित्य पर हमला कर दिया। दुष्ट राजा ने राजा विक्रमादित्य को बंदी बना लिया और उनका राज्य अपने कब्जे में ले लिया।

जयलक्ष्मी ने राजा विक्रमादित्य को बचाने का फैसला किया। उसने एक योजना बनाई और उसने दुष्ट राजा को मार डाला।

राजा विक्रमादित्य को आजाद करने के बाद, जयलक्ष्मी ने उन्हें उनका राज्य वापस दिलवा दिया। राजा विक्रमादित्य जयलक्ष्मी की बहादुरी और बुद्धिमत्ता से बहुत प्रभावित हुए। उन्होंने जयलक्ष्मी को अपनी बेटी के रूप में स्वीकार किया।

जयलक्ष्मी राजा विक्रमादित्य की सबसे प्रिय बेटी बन गई। वह राज्य की एक योग्य शासिका भी बनी।

कहानी से सीख

हमें दूसरों की मदद करनी चाहिए, भले ही वह हमारे शत्रु भी हों। हमें बुद्धिमानी से काम लेना चाहिए और कठिन परिस्थितियों में भी धैर्य नहीं खोना चाहिए। हमें अपनी गलतियों के लिए हमेशा पश्चाताप करना चाहिए।

सिंहासन बत्तीसी की अट्ठाईसवीं कहानी – “पुतली मृगनयनी की कथा”

एक बार की बात है, राजा विक्रमादित्य की एक पुतली थी जिसका नाम मृगनयनी था। यह पुतली बहुत ही सुंदर और बुद्धिमान थी। एक दिन राजा विक्रमादित्य सिंहासन पर बैठने की कोशिश कर रहे थे, तभी मृगनयनी प्रकट हुई और बोली, “ठहरो राजन्, अगर तुम इस सिंहासन पर बैठना चाहते हो तो पहले मुझे यह बताओ कि क्या तुममें वह गुण है जो महाराज विक्रमादित्य में था और जिसके बारे में मैं तुम्हें बताने जा रही हूं।”

राजा भोज ने हाथ जोड़कर कहा, “देवी कृपया उस गुण के बारे में मुझे बताएं।”

तब मृगनयनी ने कहा, “महाराज विक्रमादित्य का मन जितना राजा काज और प्रजा की कुशलता में लगता है, उससे कहीं ज्यादा वह पूजा पाठ और प्रभु भक्ति में तपस्वी के जैसे लीन रहते थे। वे इतनी कठोर तपस्या करते थे कि इंद्र देव का सिंहासन भी कांप जाता था।”

मृगनयनी ने आगे कहा, “एक दिन की बात है, राजा विक्रमादित्य के दरबार में एक इसके कुछ सैनिक एक आदमी को पकड़ कर लाए जो देखने में किसी भिखारी के जैसा लगता था, लेकिन उसके पास से बहुत सारा धन प्राप्त हुआ था। किसी भिखारी जैसे व्यक्ति के पास इतना धन कैसे आया यह सोचकर ही उसे सैनिकों ने जंगल से संदिग्ध अवस्था में गिरफ्तार किया था।”

राजा विक्रमादित्य ने जब इस बात को सुना तो वे बहुत क्रोधित हुए। उन्होंने उस आदमी को तुरंत ही फांसी की सजा सुनाई। लेकिन उस आदमी ने राजा से विनती की, “महाराज, मैं निर्दोष हूं। यह धन मुझे किसी ने दिया है।”

राजा विक्रमादित्य ने उस आदमी की बात पर विश्वास नहीं किया और उसे फांसी दे दी। लेकिन कुछ ही देर बाद उन्हें अपनी गलती का एहसास हुआ। उन्होंने अपने मंत्रियों को बुलाया और उस आदमी को फांसी देने का आदेश वापस लेने को कहा। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।

राजा विक्रमादित्य को बहुत दुख हुआ। उन्होंने सोचा कि अगर मैं उस आदमी से पहले उसकी बात सुन लेता तो आज उसकी जान बच जाती। राजा विक्रमादित्य ने उस दिन से यह संकल्प लिया कि वह कभी भी किसी की बात को बिना सुने उसे दंड नहीं देंगे।

मृगनयनी ने राजा भोज से कहा, “राजा विक्रमादित्य ने यह संकल्प तपस्या के दौरान लिया था। अगर तुम भी इस संकल्प को लेते हो तो तुम भी राजा विक्रमादित्य की तरह एक महान राजा बन सकते हो।”

राजा भोज ने मृगनयनी की बात मान ली और उन्होंने भी तपस्या के दौरान यह संकल्प लिया कि वह कभी भी किसी की बात को बिना सुने उसे दंड नहीं देंगे।

राजा भोज ने मृगनयनी से कहा, “देवी, आपने मुझे बहुत ही महत्वपूर्ण बात बताई है। मैं इस संकल्प को जीवन भर निभाऊंगा।”

मृगनयनी ने राजा भोज की प्रशंसा की और कहा, “राजन्, तुममें राजा विक्रमादित्य के गुण हैं। तुम एक महान राजा बनोगे।”

और ऐसा ही हुआ। राजा भोज ने अपने जीवन भर न्याय और धर्म का पालन किया और प्रजा को सुख-शांति प्रदान की।

सिंहासन बत्तीसी की उनतीसवीं कहानी – “पुतली मानवती की कथा”

सिंहासन बत्तीसी की उनतीसवीं कहानी “पुतली मानवती की कथा” है। इस कहानी में राजा विक्रमादित्य की प्रजा प्रेमी और न्यायप्रिय छवि को दर्शाया गया है।

कहानी के अनुसार, एक दिन राजा विक्रमादित्य वेश बदलकर रात में घूम रहे थे। ऐसे ही एक दिन घूमते-घूमते नदी के किनारे पहुंच गए। चांदनी रात में नदी का जल चमकता हुआ बड़ा ही प्यारा दृश्य प्रस्तुत कर रहा था। विक्रमादित्य चुपचाप नदी तट पर खड़े थे तभी उनके कानों में एक स्त्री की करुण पुकार सुनाई दी। वह दौड़कर उस स्थान पर पहुंचे जहां से आवाज आ रही थी।

वहां देखा कि एक युवक एक बूढ़े व्यक्ति को मारने की कोशिश कर रहा था। युवक ने बूढ़े व्यक्ति से पैसे मांगे थे, लेकिन बूढ़े व्यक्ति के पास पैसे नहीं थे। इसलिए युवक उसे मारने की धमकी दे रहा था।

राजा विक्रमादित्य ने युवक को रोका और उससे पूछा कि वह ऐसा क्यों कर रहा है। युवक ने कहा कि बूढ़ा व्यक्ति उसका कर्जदार है और वह पैसे नहीं चुका रहा है। इसलिए वह उसे मारने वाला है।

राजा विक्रमादित्य ने युवक को समझाया कि कर्ज चुकाने में देरी हो सकती है, लेकिन किसी को मारना गलत है। वह युवक को बूढ़े व्यक्ति को छोड़ने के लिए राजी कर लिया।

राजा विक्रमादित्य ने बूढ़े व्यक्ति से उसकी समस्या के बारे में पूछा। बूढ़े व्यक्ति ने बताया कि वह एक किसान है और उसकी फसल खराब हो गई है। इसलिए वह कर्ज चुकाने में असमर्थ है।

राजा विक्रमादित्य ने बूढ़े व्यक्ति को उसकी फसल का कर्ज माफ कर दिया और उसे कुछ पैसे भी दिए। बूढ़े व्यक्ति राजा विक्रमादित्य के इस कृपा से बहुत खुश हुआ।

वह युवक भी राजा विक्रमादित्य की दया से प्रभावित हुआ। उसने राजा से कहा कि वह अब से एक अच्छा इंसान बनेगा और किसी को भी नुकसान नहीं पहुंचाएगा।

राजा विक्रमादित्य ने युवक को भी समझाया कि हर किसी को दूसरों की मदद करनी चाहिए। वह युवक भी राजा विक्रमादित्य की बात मानने लगा।

इस तरह, राजा विक्रमादित्य ने अपनी न्यायप्रियता और प्रजा प्रेम से एक और व्यक्ति का जीवन बदल दिया।

कहानी से सीख

इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि हमें दूसरों की मदद करनी चाहिए, चाहे वह कोई भी हो। हमें दूसरों को नुकसान नहीं पहुंचाना चाहिए।

सिंहासन बत्तीसी तीसवीं की कहानी – “पुतली मलयवती की कथा”

सिंहासन बत्तीसी की सताईसवीं कहानी में, मलयवती नामक पुतली राजा भोज को महाराज विक्रमादित्य के दानवीरता का गुण बताती है। एक दिन, महाराज विक्रमादित्य विष्णु पुराण पढ़ रहे थे। उन्हें पता चला कि दैत्यराज बलि इतने दानवीर थे कि उन्होंने भगवान विष्णु को अपना राज्य तक दान कर दिया। महाराज विक्रमादित्य बलि से मिलने के लिए उत्सुक थे। उन्होंने भगवान विष्णु से प्रार्थना की कि वे उन्हें बलि से मिलने का मार्ग दिखाएं।

भगवान विष्णु ने महाराज विक्रमादित्य को एक शंख और एक मूंगा दिया। उन्होंने कहा कि शंख फूंकने से समुद्र दो भागों में बंट जाएगा और मूंगा के पास एक मार्ग प्रकट हो जाएगा। वह मार्ग महाराज विक्रमादित्य को पाताल लोक ले जाएगा, जहां बलि रहते थे।

महाराज विक्रमादित्य ने शंख फूंका और मूंगा को अपने साथ लेकर समुद्र में उतरे। जैसे ही उन्होंने मूंगा को समुद्र में फेंका, समुद्र दो भागों में बंट गया और एक मार्ग प्रकट हो गया। महाराज विक्रमादित्य उस मार्ग पर चलकर पाताल लोक पहुंचे।

पाताल लोक में, महाराज विक्रमादित्य बलि से मिले। उन्होंने बलि से उनके दानवीरता के बारे में पूछा। बलि ने महाराज विक्रमादित्य को बताया कि उन्होंने भगवान विष्णु को अपना राज्य दान इसलिए किया था क्योंकि वे जानते थे कि भगवान विष्णु ही उन्हें सही मार्ग दिखा सकते हैं।

महाराज विक्रमादित्य बलि से बहुत प्रभावित हुए। उन्होंने बलि से कहा कि वे उनसे बहुत कुछ सीखना चाहते हैं। बलि ने महाराज विक्रमादित्य को दानवीरता, न्याय और धर्म का पाठ पढ़ाया।

कुछ दिनों बाद, महाराज विक्रमादित्य ने बलि से विदा ली। उन्होंने बलि से कहा कि वे उनके उपदेशों को हमेशा याद रखेंगे।

मलयवती ने राजा भोज को यह कहानी सुनाकर उन्हें बताया कि महाराज विक्रमादित्य कितने दानवीर थे। उन्होंने राजा भोज को भी दानवीर बनने के लिए प्रेरित किया।

राजा भोज ने मलयवती की बात मान ली। उन्होंने दानवीरता का गुण अपने जीवन में अपना लिया। वे अपनी प्रजा के लिए हमेशा दान करते रहे।

सिंहासन बत्तीसी की इकत्तीसवीं कहानी – “पुतली त्रिनेत्री की कथा”

एक समय की बात है, एक राज्य में एक राजा विक्रमादित्य राज्य करते थे। वे एक न्यायप्रिय और दयालु राजा थे। उनकी प्रजा उनसे बहुत प्यार करती थी।

एक दिन राजा विक्रमादित्य अपनी प्रजा के सुख-दुख का पता लगाने के लिए वेश बदलकर घूम रहे थे। उन्होंने देखा कि एक गाँव में एक दरिद्र ब्राह्मण और भाट रहते थे। वे दोनों अपना कष्ट अपने तक ही सीमित रखते हुए जीवन-यापन कर रहे थे। वे अपनी गरीबी को अपना प्रारब्ध समझकर सदा खुश रहते थे तथा सीमित आय से संतुष्ट थे।

ब्राह्मण और भाट दोनों में बहुत अच्छी मित्रता थी। वे एक-दूसरे के दुख-सुख में सदैव साथ रहते थे। एक दिन भाट की बेटी का विवाह योग्य हो गया। भाट की पत्नी को उसकी शादी की चिंता सताने लगी। वह ब्राह्मण से बोली, “बेटी का विवाह करने के लिए हमें बहुत धन की आवश्यकता होगी। हमें किसी तरह से धन जुटाना होगा।”

ब्राह्मण ने कहा, “धन तो हमें किसी तरह से जुटाना ही होगा। मैं राजा विक्रमादित्य से मदद माँगने जाऊँगा।”

ब्राह्मण राजा विक्रमादित्य के पास गया और अपनी समस्या बताई। राजा विक्रमादित्य ने ब्राह्मण की समस्या सुनकर उसे दस लाख स्वर्ण मुद्राएं दे दीं। ब्राह्मण बहुत खुश हुआ और उसने भाट की बेटी का विवाह बहुत धूमधाम से कर दिया।

विवाह के बाद भाट की बेटी बहुत सुखी थी। वह अपने पति के साथ बहुत प्यार से रहती थी। एक दिन भाट की बेटी ने अपने पति से कहा, “मैं अपने पिता का बहुत आभारी हूँ कि उन्होंने मुझे इतना धन दिया। अब मैं अपने पति के साथ सुखी जीवन जी सकती हूँ।”

भाट की बेटी के पति ने कहा, “तुम्हारी माँ भी तुम्हारी पिता की बहुत आभारी है। वह हमेशा तुम्हारे पिता की प्रशंसा करती है।”

भाट की बेटी ने कहा, “मैं भी अपनी माँ की तरह अपने पिता की प्रशंसा करती हूँ। वह एक बहुत ही दयालु और न्यायप्रिय राजा हैं।”

भाट की बेटी की बातें सुनकर उसके पति को बहुत खुशी हुई। वह बोला, “तुम्हारी बातें सुनकर मुझे भी तुम्हारे पिता पर बहुत गर्व हुआ।”

भाट की बेटी और उसके पति दोनों राजा विक्रमादित्य की बहुत प्रशंसा करते थे।

एक दिन राजा विक्रमादित्य ने अपनी प्रजा के सुख-दुख का पता लगाने के लिए वेश बदलकर फिर से घूमना शुरू कर दिया। उन्होंने देखा कि भाट की बेटी बहुत खुश और संतुष्ट लग रही थी। राजा विक्रमादित्य को भाट की बेटी की खुशी देखकर बहुत खुशी हुई। उन्होंने भाट की बेटी से बात की और उसकी खुशी का कारण पूछा।

भाट की बेटी ने राजा विक्रमादित्य को बताया कि वह अपने पिता और पति की वजह से बहुत खुश है। उसके पिता ने उसे बहुत धन दिया है, जिससे वह अपनी शादी अच्छे से कर सकी है। उसका पति भी बहुत अच्छा है और वह उसे बहुत प्यार करता है।

राजा विक्रमादित्य ने भाट की बेटी की बातें सुनकर बहुत खुशी हुई। उन्होंने भाट की बेटी को आशीर्वाद दिया और कहा, “तुम हमेशा खुश रहो।”

राजा विक्रमादित्य ने भाट की बेटी के घर से जाते समय एक त्रिनेत्री पुतली उसे भेंट की। राजा विक्रमादित्य ने भाट की बेटी से कहा, “यह त्रिनेत्री पुतली बहुत ही चमत्कारी है। यह तुम्हें और तुम्हारे परिवार को हमेशा खुश रखेगी।”

भाट की बेटी ने त्रिनेत्री पुतली को अपने घर ले जाकर रख दी। भाट की बेटी और उसका परिवार हमेशा खुश और संतुष्ट रहता था। त्रिनेत्री पुतली की वजह से उनके घर में हमेशा सुख-समृद्धि बनी रहती थी।

कहानी का सार

यह कहानी हमें यह सिखाती है कि हमें हमेशा दूसरों की मदद करनी चाहिए। दूसरों की मदद करने से हमें भी सुख और संतुष्टि होती है।

सिंहासन बत्तीसी की बत्तीसवीं कहानी – “पुतली सुनयना की कथा”

एक बार की बात है, एक राजा थे जिनका नाम भोज था। वे बहुत ही गुणवान और न्यायप्रिय राजा थे। उनकी प्रजा उनसे बहुत प्रेम करती थी। एक दिन, राजा भोज अपने दरबार में बैठे थे कि अचानक एक पुतली उनके सामने प्रकट हो गई। पुतली बहुत ही सुंदर और आकर्षक थी।

राजा भोज ने पुतली से पूछा, “तुम कौन हो और यहां क्यों आई हो?”

पुतली ने कहा, “मैं इस सिंहासन की रखवाली करने वाली पुतली हूं। इस सिंहासन पर सिर्फ वही राजा बैठ सकता है जो राजा विक्रमादित्य के समान गुणवान हो।”

राजा भोज ने कहा, “मैं राजा विक्रमादित्य के समान गुणवान हूं। मैं इस सिंहासन पर बैठने का हकदार हूं।”

पुतली ने कहा, “राजा विक्रमादित्य के समान गुणवान होने के लिए, तुम्हें पहले उनकी कुछ कहानियां सुननी होंगी।”

राजा भोज ने कहा, “मैं राजा विक्रमादित्य की कहानियां सुनने के लिए तैयार हूं।”

उसके बाद, पुतली ने राजा भोज को राजा विक्रमादित्य की कई कहानियां सुनाईं। कहानियां सुनकर राजा भोज बहुत प्रभावित हुए। उन्होंने महसूस किया कि उन्हें राजा विक्रमादित्य के समान गुणवान बनने के लिए बहुत कुछ सीखना है।

पुतली ने राजा भोज को कहा, “तुम अभी भी राजा विक्रमादित्य के समान गुणवान नहीं हो। तुम्हें अभी भी बहुत कुछ सीखना है। जब तुम राजा विक्रमादित्य के समान गुणवान हो जाओगे, तभी तुम इस सिंहासन पर बैठने का हकदार होओगे।”

राजा भोज ने पुतली को कहा, “मैं राजा विक्रमादित्य के समान गुणवान बनने के लिए अपना सर्वश्रेष्ठ प्रयास करूंगा।”

पुतली ने राजा भोज को आशीर्वाद दिया और वह अंतर्ध्यान हो गई।

राजा भोज ने पुतली की बातों को ध्यान से सुना और उन पर अमल करने की ठान ली। उन्होंने राजा विक्रमादित्य की कहानियों को बार-बार पढ़ा और उनसे सीखना शुरू किया। उन्होंने अपने गुणों को सुधारने के लिए बहुत प्रयास किया।

कुछ समय बाद, राजा भोज ने महसूस किया कि वे राजा विक्रमादित्य के समान गुणवान हो गए हैं। उन्होंने पुतली को फिर से बुलाया और कहा, “मैं अब राजा विक्रमादित्य के समान गुणवान हो गया हूं। मैं इस सिंहासन पर बैठने का हकदार हूं।”

पुतली ने राजा भोज की परीक्षा ली और उन्हें पाया कि वे अब राजा विक्रमादित्य के समान गुणवान हो गए हैं। पुतली ने राजा भोज को सिंहासन पर बैठने की अनुमति दे दी।

राजा भोज ने सिंहासन पर बैठकर प्रजा का शासन करना शुरू किया। वे एक बहुत ही अच्छे और न्यायप्रिय राजा थे। उनकी प्रजा उनसे बहुत खुश थी।

शिक्षा

इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि हमें हमेशा अच्छे गुणों को अपनाने का प्रयास करना चाहिए। अगर हम अच्छे गुणों को अपनाते हैं, तो हम एक अच्छे इंसान और एक अच्छे राजा बन सकते हैं।

निष्कर्ष

सिंहासन बत्तीसी की कहानी का निष्कर्ष यह है कि सच्चा ज्ञान और बुद्धिमत्ता ही किसी भी समस्या का समाधान कर सकती है। कहानी में, राजा भोज को सिंहासन पर बैठते ही एक भयानक सपना आता है। उस सपने में, उसे एक ज्योतिषी बताता है कि अगर वह सिंहासन पर बत्तीसवीं पुतली को नहीं बिठाता है, तो उसे और उसकी प्रजा को बहुत दुख होगा। राजा भोज इस सपने से बहुत परेशान हो जाता है और वह बत्तीसवीं पुतली को ढूंढने के लिए निकल पड़ता है।

अपने सफर में, राजा भोज कई तरह की चुनौतियों का सामना करता है। वह एक जादूगरनी से लड़ता है, एक पहाड़ को पार करता है, और एक सागर को तैरकर पार करता है। आखिरकार, वह बत्तीसवीं पुतली को ढूंढ लेता है। बत्तीसवीं पुतली एक बहुत ही बुद्धिमान और दयालु लड़की है। वह राजा भोज को सपने का रहस्य बताती है और उसे बताती है कि कैसे सिंहासन पर बैठने से प्रजा को नुकसान होगा।

राजा भोज बत्तीसवीं पुतली की बात मानता है और वह सिंहासन पर नहीं बैठता है। इससे प्रजा को बहुत खुशी होती है। कहानी का अंत इस बात पर होता है कि राजा भोज और बत्तीसवीं पुतली शादी कर लेते हैं और वे एक सुखी जीवन बिताते हैं।

इस कहानी से हमें यह भी सीख मिलती है कि हम किसी भी समस्या का समाधान करने से पहले सोच-समझकर निर्णय लें। हमें किसी भी बात पर जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए।

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